भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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पृष्ठ 530

॥ ब्रह्मसूत्रम् ॥ अध्याय ३, पाद ४, सूत्र ४१ [अवतरणिका एवं पूर्वपक्षः] अग्रिमे सूत्रे स्वानिष्ठभक्तापेक्षया निरपेक्षभक्तस्य श्रेष्ठत्वं प्रतिपाद्यते। अत्र कश्चित् पूर्वपक्षी आशङ्कते—किं न दृश्यते यत् "सर्वं ह पश्यः पश्यति" इत्यादिश्रुतिवचनात् ब्रह्मविद्या निरपेक्षभक्तस्यापि स्वर्गलोकादिसम्पत्तिं विधत्ते? यदा च ते इन्द्रादिदेवतानां लोकेषु प्रविशेयुः, तदा तत्रत्येषु प्राकृतभोगेषु तेषां सङ्गासक्त्या भगवद्भक्तेः शैथिल्यं विनाशो वा न स्यात् किम्? एतादृशीमाशङ्कां निरसितुं सूत्रकारः सिद्धान्तसूत्रमाह— [सूत्रम्] न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात् ॥ ३।४।४१ ॥ [पदच्छेदः] न—नहीं; च—एवं/अवधारणार्थे; आधिकारिकम्—अधिकारिपदम् (इन्द्रादिपदम्); अपि—अपि (समस्तभोगसङ्ग्रहार्थे); पतनानुमानात्—पतनस्य स्मृतिप्रमाणात्; तत्-अयोगात्—तेषां तत्र योगाभावात् (आसक्तेरभावात्)। [सूत्रार्थः] निरपेक्ष भक्त आधिकारिकादि (इन्द्रादि) पदों को भी नहीं चाहते, क्योंकि वहाँ से पतन का स्मृति-प्रमाण (अनुमान) है तथा उनमें विषय-भोगों के प्रति आसक्ति का सर्वथा अभाव है। [श्रीबलदेवविद्याभूषण-विरचितं गोविन्दभाष्यम्] अत्र 'च' शब्दोऽवधारणार्थे प्रयुक्तः। 'अपि' शब्दस्तु कृत्स्नप्राकृतभोगसङ्ग्रहार्थः। 'आधिकारिकम्' इन्द्रादिपदं निरपेक्षा भक्ता नेच्छन्ति। कुतः? 'पतनानुमानात्'—पतने स्मृतिप्रमाणादित्यर्थः। तथा हि स्मर्यते भगवद्गीतायाम् (८।१६)— आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ अर्थाद् ब्रह्मलोकपर्यन्ताः सर्वे लोकाः पुनरावर्तनशीलाः सन्ति। किञ्च, 'तदयोगात्'—तेषां निरपेक्षाणां प्राकृतभोगेषु सर्वथाऽभिलाषाभावात्। स्मृतिशतैस्तन्निरासात्। अतो यद्यपि ब्रह्मविद्याया माहात्म्यं सर्वव्यापकं वर्तते, तथापि निरपेक्षा भक्ताः कदापि प्राकृतैश्वर्येषु न सज्जन्ते। [हिन्दी-भावार्थः] प्रस्तुत सूत्र में यह सिद्ध किया गया है कि निरपेक्ष भक्त स्वानिष्ठ भक्त से श्रेष्ठ हैं। यहाँ यह शङ्का की गई थी कि "सर्वं पश्यः पश्यति" (वह सब कुछ देखता है) इत्यादि श्रुति-वाक्यों के अनुसार तत्त्वज्ञानी को समस्त ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं, अतः निरपेक्ष भक्त भी स्वर्ग आदि लोकों को प्राप्त करके इन्द्रादि पदों के भोगों में आसक्त होकर अपनी अनन्य भक्ति से च्युत हो सकते हैं। इस शङ्का का समाधान करते हुए श्रील बलदेव विद्याभूषण स्पष्ट करते हैं: सूत्र में प्रयुक्त 'च' शब्द बल देने के लिए है और 'अपि' शब्द समस्त प्राकृत सुख-भोगों का समावेश करने के लिए है। 'आधिकारिक' पद से इन्द्र आदि देवताओं के पदों का बोध होता है। निरपेक्ष भक्त इन पदों की तनिक भी इच्छा नहीं करते। इसका कारण सूत्र में 'पतनानुमानात्' बतलाया गया है, क्योंकि स्मृतियों में इन पदों से पतन होना निश्चित कहा गया है। जैसा कि भगवद्गीता (८।१६) में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं: "हे अर्जुन! ब्रह्मलोक से लेकर नीचे के समस्त लोक पुनरावर्ती हैं (जहाँ से पुनः संसार में लौटना पड़ता है)।" इसके अतिरिक्त निरपेक्ष भक्तों में इन प्राकृत भोगों के प्रति कोई रुचि या कामना नहीं होती ('तदयोगात्'), अतः वे इन ऐश्वर्यों से सर्वथा अनासक्त रहते हैं और उनकी भगवद्भक्ति अखण्ड बनी रहती है।