भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

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सूत्रम्: अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ॥ (वे शिष्य-परम्परा के नियम के कारण ज्ञान प्रकट नहीं करते हैं।) श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित तात्पर्य: यहाँ "अनाविष्कुर्वन्" शब्द का अर्थ है, "वह दिव्य ज्ञान की शिक्षा सबको प्रकट रूप से नहीं देता।" ऐसा क्यों है? सूत्र स्पष्ट करता है: "अन्वयात्" (शिष्य-परम्परा की विधि के कारण)। यह बात श्वेताश्वतर उपनिषद् के पूर्वोक्त प्रमाण से स्पष्ट घोषित है। कमलनयन स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने इन शब्दों में इसे व्यक्त किया है (श्रीमद्भगवद्गीता १८.६७): इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ "यह गुह्य ज्ञान कभी भी उसे नहीं बताना चाहिए जो तपस्या से हीन हो, जो भक्त न हो, जो श्रवण-सेवा में तत्पर न हो, अथवा जो मुझसे ईर्ष्या रखता हो।" जब यह ज्ञान सुपात्र को दिया जाता है, तो यह दिव्य ज्ञान फलप्रद होता है; किन्तु जब यह अपात्र को दिया जाता है, तो यह फल उत्पन्न नहीं करता। यह श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.२३) में व्याख्यायित है: यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । . . . "जिन महापुरुषों की भगवान् में परा भक्ति है और जैसी भगवान् में है वैसी ही गुरु में है, उन महात्माओं के हृदय में ही वैदिक ज्ञान के समस्त गूढ़ अर्थ स्वतः प्रकाशित होते हैं।" छान्दोग्य उपनिषद् (८.७.१–८.१५.१) में इन्द्र और विरोचन की कथा आती है कि उन दोनों को ही आत्मज्ञान का उपदेश दिया गया था। तथापि, विरोचन एक उपयुक्त शिष्य नहीं था, इसलिए वह इसे यथार्थ रूप से नहीं समझ सका। अतः यह दिव्य ज्ञान उन्हीं को सिखाना चाहिए जो इसे समझने में समर्थ हों। उन्हें नहीं सिखाना चाहिए जो असमर्थ हों। जो श्रद्धालु हैं तथा शास्त्रों को स्वीकार करते हैं, वे ही इसे समझने में सक्षम होते हैं। अधिकरण १५