भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 647 में से

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पृष्ठ 570

॥ श्रीमद्ब्रह्मसूत्रम् ॥ चतुर्थोऽध्यायः (फलध्यायः) — प्रथमः पादः द्वादशमधिकरणम् — अग्निहोत्राद्यधिकरणम् (नित्यकर्मणां ज्ञानानष्टत्वविचारः / नित्यकर्म एवं कर्मफल) श्रील बलदेवविद्याभूषण-प्रणीत-गोविन्दभाष्ये अवतरणिका: अत्र कश्चिदाशङ्केत—पूर्वेण ज्ञानेन पूर्वार्जितानां सर्वेषां सुकृतानां विनाशाभिधानात्, काम्यकर्मवन्नित्यकर्मणामपि फलविनाशः स्यात्। हिन्दी अनुवाद: यहाँ कोई यह शङ्का कर सकता है कि यह कहा गया है कि दिव्यज्ञान समस्त पूर्वार्जित पुण्य-कर्मों के फलों को नष्ट कर देता है। अतः ज्ञान जिस प्रकार सकाम कर्मों (काम्य-कर्मों) का विनाश करता है, उसी प्रकार नित्यकर्मों (अग्निहोत्रादि विहित कर्मों) का भी नाश कर देता होगा। इति प्राप्तौ तन्निराकरणायेदमाह— हिन्दी अनुवाद: इस भ्रम या विचार के निराकरण के लिए यह वर्तमान अधिकरण आरम्भ किया जाता है। संशयः: बृहदारण्यकोपनिषदि (४।४।२२)—"तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन" इत्यादिश्रुतिषु ज्ञानिनां सुकृतदुष्कृतयोः प्रणाशः श्रूयते। हिन्दी अनुवाद (संशय): बृहदारण्यकोपनिषद् (४।४।२२) में यह वर्णन मिलता है कि ब्रह्मज्ञान भूतकाल के समस्त पुण्य और पापमय कर्मफलों को विनष्ट कर देता है। तत्र किं काम्यकर्मवदग्निहोत्रादीनामपि नित्यकर्मणां विहितयज्ञानां च फलं विनश्यति, उत न विनश्यति इति संशयः। हिन्दी अनुवाद: तो क्या काम्य-कर्मों के फल के समान अग्निहोत्र-यज्ञादि नित्य-कर्मों के फल भी ब्रह्मज्ञान द्वारा नष्ट हो जाते हैं अथवा नष्ट नहीं होते हैं? पूर्वपक्षः: पूर्वपक्षी मन्यते—ज्ञानस्य स्वभाव एव सकलकर्मफलविनाशकत्वम्। न हि ज्ञानं स्वस्वभावं जहाति, तस्मादग्निहोत्रादीनामपि नित्यकर्मणां नाशो भवेदेव। हिन्दी अनुवाद (पूर्वपक्ष): पूर्वपक्षी का कथन है कि ज्ञान का स्वभाव ही समस्त कर्म-प्रतिक्रियाओं को नष्ट करना है। चूँकि ज्ञान अपने स्वभाव का त्याग नहीं कर सकता, अतः उसे नित्यकर्मों की प्रतिक्रियाओं को भी विनष्ट करना ही चाहिए। सिद्धान्तः: अत्र सिद्धान्तमुच्यते—एवं प्राप्ते भगवता सूत्रकृता सिद्धान्त उच्यते। हिन्दी अनुवाद (सिद्धान्त): इस प्रकार पूर्वपक्ष के प्राप्त होने पर सूत्रकार भगवान् बादरायण अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं— ब्रह्मसूत्रम् — सूत्र १६: अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ॥ १६ ॥ पदच्छेदः: अग्निहोत्रादि — अग्निहोत्र-यज्ञादयः नित्यकर्माणि (अग्निहोत्र इत्यादि नित्यकर्म) तु — अपि तु, पूर्वपक्षव्यावृत्तौ (किन्तु / पूर्वपक्ष के खण्डनार्थ) तत्कार्याय — तस्य ज्ञानस्य कार्याय (उस ज्ञान की उत्पत्ति रूप कार्य के लिए) एव — केवलम्, निश्चयेन (ही) तद्दर्शनात् — तस्य श्रुतौ दर्शनात्, प्रमाणात् (क्योंकि श्रुति में ऐसा ही देखा/कहा गया है) सूत्रार्थः: संस्कृतार्थः: अग्निहोत्रादिकं नित्यं कर्म तु तत्कार्याय एव—ज्ञानोत्पत्तये एव भवति, न तु विनश्यति; कुतः? तद्दर्शनात्—श्रुतौ तथैव दर्शनात्। हिन्दी अनुवाद: किन्तु अग्निहोत्रादि नित्यकर्म उस ज्ञान की उत्पत्ति रूप कार्य के लिए ही होते हैं (अर्थात् वे ज्ञान के साधन बनते हैं, नष्ट नहीं होते), क्योंकि श्रुति में ऐसा ही विधान देखा जाता है। श्रील बलदेवविद्याभूषण-प्रणीत-गोविन्दभाष्य-तात्पर्यम्: ज्ञानोत्पत्तये नित्यकर्मणां सहकारित्वेन श्रुतौ प्रतिपादितत्वात् न तेषां काम्यकर्मवत् विनाशः सम्भवति।

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