गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्रम्: तेजः परस्याम् (तथाह्याह) अर्थ: "तेज परब्रह्म में लीन होता है।" भाष्यम्: इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि यहाँ "तेज" शब्द से उपलक्षित वाक् आदि इन्द्रियाँ, मुख्य प्राण तथा भूतसूक्ष्म— ये सभी परम पुरुषोत्तम श्रीभगवान् (परब्रह्म) में ही लीन होते हैं; क्योंकि परब्रह्म ही समस्त प्रपञ्च का मूल कारण एवं परम आश्रय है। ऐसा क्यों माना जाए? इसके उत्तर में सूत्रकार कहते हैं— "तथा हि आह" अर्थात् "क्योंकि श्रुति-शास्त्र ऐसा ही स्पष्ट विधान करता है।" यह छान्दोग्योपनिषद् (६.८.६) के वचन से प्रमाणित है— श्रुति-प्रमाण: "तेजः परस्यां देवतायाम्" श्रुत्यर्थ: "तेज परम देवता (परमेश्वर) में लीन होता है।" बृहदारण्यकोपनिषद् (३.२.३) में जो ओषधि-वनस्पत्यादि में लय का उल्लेख है, वह औपचारिक (गौण/लाक्षणिक) समझना चाहिए। इसका परिहार पूर्व में (ब्रह्मसूत्र ३.१.४ के व्याख्यान में) भलीभाँति किया जा चुका है। ॥ सप्तमाधिकरणम् ॥ अधिकरण-विषय: परब्रह्म में इन्द्रियों के लय का स्वरूप (इन्द्रियाणां परब्रह्मणि लयस्वरूप-विचारः) श्रील बलदेव विद्याभूषण-विरचिता अवतरणिका (भूमिका): अब एक अन्य विचारणीय विषय की समीक्षा की जाती है। संशय: जब तत्त्वज्ञानी पुरुष के प्राण, वाक्, मन तथा अन्यान्य इन्द्रियाँ परब्रह्म में प्रविष्ट होती हैं, तब क्या उनका केवल प्रवेश (सम्पर्क मात्र) होता है अथवा वे परब्रह्म के साथ अविभक्त (एकीभूत) हो जाती हैं, जैसा कि मुण्डकोपनिषद् (३.२.८) में कहा गया है? पूर्वपक्ष: पूर्वोक्त वाक्यों के आधार पर तथा किसी विशिष्ट भेदक वचन के अभाव में, यही मानना उचित है कि उनका केवल परब्रह्म में प्रवेश मात्र ही होता है (पूर्ण एकीभाव नहीं)। सिद्धान्त: इस पूर्वपक्ष के निराकरण हेतु सूत्रकार श्रीभगवान् बादरायण अग्रिम सूत्र द्वारा अपना निर्णीत सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं।