भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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उपनिषद् (१.३) में कहा गया है: स एतं देवयानं पन्थानमापद्याग्निलोकमागच्छति स वायुलोकं स वरुणलोकं स इन्द्रलोकं स प्रजापतिलोकं स ब्रह्मलोकम् ॥ "वह देवयान-मार्ग को प्राप्त होकर अग्निलोक में जाता है, वह वायुलोक में जाता है, वह वरुणलोक में जाता है, वह इन्द्रलोक में जाता है, वह प्रजापतिलोक में जाता है, वह ब्रह्मलोक में जाता है।" यहाँ अग्निलोक प्रथम पर्व (स्थान) है। बृहदारण्यकोपनिषद् (५.१०) में कहा गया है: यदा ह वै पुरुषोऽस्माल्लोकात्प्रैति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स आदित्यमागच्छति ॥ "जब जीवात्मा इस लोक से प्रयाण करता है, तब वह वायु को प्राप्त होता है। वहाँ वायु उसके लिए रथचक्र के छिद्र के समान अवकाश देता है, उससे वह ऊर्ध्व गमन कर सूर्य को प्राप्त होता है।" यहाँ वायुलोक मार्ग का प्रथम चरण है। मुण्डकोपनिषद् (१.२.११) में कहा गया है: सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति । "सूर्य-द्वार से होकर वे विरज (पापरहित) मुमुक्षु गमन करते हैं।" यहाँ सूर्य मार्ग का प्रथम चरण है। अन्य शास्त्रों में भी अन्य प्रकार के वर्णन देखने को मिलते हैं। संशय: क्या यहाँ परब्रह्म के लोक को जाने वाला केवल एक ही मार्ग वर्णित है, अथवा उपनिषदों के इन वचनों में अर्चि आदि (प्रकाश) से आरम्भ होने वाले अनेक भिन्न-भिन्न मार्गों का प्रतिपादन किया गया है? पूर्वपक्ष: क्योंकि ये सभी मार्ग परस्पर भिन्न प्रतीत होते हैं, अतः ये अनेक भिन्न-भिन्न मार्ग ही होने चाहिए। सिद्धान्त: आगामी शब्दों में सूत्रकार (महर्षि बादरायण) अपना सिद्धान्त/निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। सूत्र १ : अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ॥ ४.३.१ ॥