गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ चतुर्थाध्यायस्य तृतीयपादे चतुर्थम् आतिवाहिकाधिकरणम् ॥ (अधिकरण ४ : आतिवाहक-देवतागण) श्रील बलदेवविद्याभूषणविरचित-गोविन्दभाष्यम् — भूमिका : अर्चिरादिमार्गे कश्चिद्विशेषश्चिन्त्यते । (हिन्दी अनुवाद : अब अर्चि (प्रकाश) आदि से प्रारम्भ होने वाले मार्ग के एक विशिष्ट विषय पर विचार किया जाता है।) संशयः — किमेतेऽर्चिरादयो मार्गचिह्नानि, उत गन्तॄणां नेतारश्चेतना विशेषाः ? (संशय : क्या ये अर्चि आदि मार्ग के केवल चिह्न-स्थान हैं, अथवा मुक्त आत्मा को ले जाने वाले चेतन वाहक देवता हैं?) पूर्वपक्षः — तत्र मार्गचिह्नानि तावदिति प्राप्तम्, श्रुतौ तद्रूपेणैव निर्देशात् । लोके हि पन्थानमुपदिशन्तो गिर्यादीनि चिह्नानि निर्दिशन्ति—"इतो नद्यां गन्तव्यम्, ततो गिरिः, तदनन्तरं ग्रामः" इति । अथवा शब्दानां तथा व्याख्यानसम्भवात् ते चेतनाः पुरुषा अपि भवेयुः । (पूर्वपक्ष : अर्चि आदि मार्गचिह्न ही हैं क्योंकि श्रुति में उनका वैसा ही वर्णन है, जैसे लोक में मार्ग बताने वाले कहते हैं—'नदी तक जाओ, फिर पर्वत आयेगा, उसके बाद गाँव आयेगा' अथवा शब्दों के अर्थानुसार वे पुरुष भी हो सकते हैं।) सिद्धान्तः — इत्येवं प्राप्ते प्रत्याह सूत्रकारः स्वसिद्धान्तम्— (सिद्धान्त : ऐसा प्राप्त होने पर सूत्रकार श्रीवेदव्यास अपना प्रामाणिक निर्णय प्रस्तुत करते हैं—) ॥ ब्रह्मसूत्रम् ४।३।४ ॥ आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात् ॥ ४ ॥ पदच्छेदः तथा शब्दार्थः — आतिवाहिकाः — अतिवाहयन्ति प्रापयन्तीत्यातिवाहिकाः (मार्ग में वहन कर ले जाने वाले देवतागण) ; तत् — तस्य (उस नयन कराने के) ; लिङ्गात् — चिह्नात् (लक्षण वा सामर्थ्य-द्योतक चिह्न उपलब्ध होने से) । सूत्रार्थः — अर्चिरादयः आतिवाहिका एव देवताविशेषा भवितुमर्हन्ति, तल्लिङ्गदर्शनात् । (हिन्दी अनुवाद : अर्चि आदि आतिवाहक देवता हैं, क्योंकि उनमें जीवात्मा को ले जाने का लक्षण पाया जाता है।) श्रील बलदेवविद्याभूषणविरचित-गोविन्दभाष्यम् — भावार्थ एवं तात्पर्य : अर्चिरादयः परमपुरुषेण तन्नयनायाधिकृताश्चेतना विशेषा एवेत्यवगन्तव्यम् । न ह्येते केवलं मार्गचिह्नानि, नापि साधारणमनुष्याः । कुत एतत् ? यतः सूत्रमाह—"तल्लिङ्गात्" इति । अन्यान्नयन्ति वहन्तीति तल्लक्षणोपपत्तेः । तथा हि छान्दोग्योपनिषदि श्रूयते— "तत्पुरुषोऽमानवः स एनान् ब्रह्म गमयति" (छा० उप० ४।१५।५, ५।१०।२) इति । (हिन्दी अनुवाद : प्रकाश (अर्चि) आदि से प्रारम्भ होने वाले तत्त्व परमपुरुष भगवान् द्वारा जीवात्मा को वहन करने (ले जाने) के लिए नियुक्त आतिवाहक देवता हैं। वे न तो केवल मार्ग-चिह्न हैं और न ही साधारण व्यक्ति। ऐसा क्यों है? सूत्र स्पष्ट करता है—'तल्लिङ्गात्' अर्थात् उनमें दूसरों को वहन कर ले जाने का लक्षण विद्यमान है। छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है : "वह अमानव पुरुष इनको परब्रह्म तक पहुँचाता है।")