गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीब्रह्मसूत्रम् ॥ ॥ चतुर्थोऽध्यायः (फलध्यायः) - तृतीयः पादः ॥ [पूर्वसन्दर्भः - परब्रह्मप्राप्तिविचारः एवं जैमिनिमतोपसंहारः] (श्रुतिः - कठोपनिषद् २।३।१६) "शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥" (श्रुतिः - कठोपनिषद् १।२।१४) "अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥" [पूर्वपक्ष/जैमिनिमत-भाष्यसारः] मुक्तजीवः स्वकीयमाविर्भूतं शुद्धं स्वरूपं प्राप्नोति। यदि अत्र ब्रह्मशब्देन कार्यं हिरण्यगर्भाख्यं ब्रह्म गृह्येत, तर्हि एतानि सर्वाणि विशेषणानि न सङ्गच्छेरन्। अस्मिन् प्रकरणे हि परमेव ब्रह्म गम्यत्वेनोपदिश्यते, न तु कार्यब्रह्म। कठवल्लीश्रुतौ "शतं चैका" इत्यादौ परस्यैव ब्रह्मणोऽमृतत्वफलकत्वं स्पष्टम्। तथा "धर्मादन्यत्र" इति श्रुतावपि तस्यैवामृतत्वप्रतिपादनात् परब्रह्मैव गम्यम्। सूत्रम् १४: ॥ न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः ॥ १४ ॥ पदच्छेदः: न, च, कार्ये, प्रतिपत्ति-अभिसन्धिः। पद-पदार्थः: न — नहीं। च — और। कार्ये — कार्यब्रह्म (हिरण्यगर्भ) में। प्रतिपत्ति — ज्ञान अथवा प्राप्ति का। अभिसन्धिः — सङ्कल्प अथवा अभिलाषा। सूत्रार्थः: कार्यब्रह्म (चतुर्मुख ब्रह्मा) में साधक की प्राप्ति या ज्ञान का सङ्कल्प (अभिसन्धि) नहीं होता, अतः अमानव पुरुष द्वारा कार्यब्रह्म की प्राप्ति नहीं कराई जाती। ॥ श्रीबलदेवविद्याभूषण-गोविन्दभाष्य-तात्पर्यम् ॥ अत्र 'प्रतिपत्ति' शब्देन ज्ञानं प्राप्तिश्चोच्यते, 'अभिसन्धि' शब्देन च सङ्कल्पः। तत्त्वज्ञानसम्पन्नस्य उपासकस्य कार्ये हिरण्यगर्भे प्रतिपत्त्यभिसन्धिर्न भवति, तस्य परमपुरुषार्थत्वाभावात्। परब्रह्मण्येव तु तस्य प्राप्तिसङ्कल्पो वर्तते। "तं यथा यथोपासते तथैव भवति" इति श्रुत्यनुसारेण (छान्दोग्योपनिषद् ३।१४।१ — "यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति") यत्सङ्कल्पवान् स तदेव प्राप्नोति। अतः अमानवः पुरुषः परब्रह्मोपासकानेव परं ब्रह्म गमयति — इति जैमिनेर्मतम्। [हिन्दी-अनुवादः] यहाँ 'प्रतिपत्ति' का अर्थ ज्ञान या प्राप्ति है और 'अभिसन्धि' का अर्थ सङ्कल्प अथवा इच्छा है। दिव्य ज्ञान से सम्पन्न मुमुक्षु जीव कार्यब्रह्म (ब्रह्मा जी) को प्राप्त करने की इच्छा नहीं करता, क्योंकि उनकी प्राप्ति जीवन का परम लक्ष्य (परम पुरुषार्थ) नहीं है। वह केवल परब्रह्म को ही जानने और प्राप्त करने की इच्छा करता है, जो कि सर्वोच्च ध्येय है। मनुष्य जैसा सङ्कल्प करता है, वैसी ही गति पाता है, जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् (३।१४) में कहा गया है। अतः आतिवाहिक दिव्य पुरुष भक्तों को परम पुरुषोत्तम भगवान् के पास ही ले जाता है, यह महर्षि जैमिनी का मत है। [अथ सिद्धान्तः - बादरायणमतम्] अधुना भगवान् सूत्रकारः स्वमतं सिद्धान्तत्वेनोपस्थापयति — सूत्रम् १५: ॥ अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथा च दोषात्तत्क्रतुश्च ॥ १५ ॥ पदच्छेदः: अप्रतीक-आलम्बनान्, नयति, इति, बादरायणः, उभयथा, च, दोषात्, तत्-क्रतुः, च। पद-पदार्थः: अप्रतीकालम्बनान् — जो प्रतीक (नामादि अचेतन विकार) का आश्रय न लेकर साक्षात् परब्रह्म अथवा तदन्तर्यामी का आश्रय लेते हैं, उनको। नयति — (अमानव पुरुष) ब्रह्मलोक को ले जाता है। इति — ऐसा। बादरायणः — भगवान् वेदव्यास (सूत्रकार) मानते हैं। उभयथा — दोनों पक्षों को (केवल कार्यब्रह्म अथवा केवल परब्रह्म) एकान्ततः स्वीकार करने में। च — और। दोषात् — दोष होने के कारण। तत्-क्रतुः — "तत्क्रतु-न्याय" (जैसा सङ्कल्प वैसी प्राप्ति) की श्रुति होने से। च — भी। सूत्रार्थः: भगवान् बादरायण व्यास जी का निर्णय है कि अमानव पुरुष केवल उन्हीं उपासकों को दिव्य गति (ब्रह्मलोक) में ले जाता है जो प्रतीक का आलम्बन नहीं करते (अर्थात् अप्रतीकालम्बन हैं); क्योंकि केवल कार्यब्रह्म के उपासकों को ही ले जाया जाता है अथवा केवल परब्रह्म के उपासकों को ही ले जाया जाता है—इन दोनों एकपक्षीय मतों में दोष आता है, तथा "जैसा ध्यान, वैसा फल" (तत्क्रतु न्याय) यह श्रुति का सिद्धान्त है। [भाष्य-विवरणम्] बादरायण मते न तु सर्वथा कार्यब्रह्मोपासका एव नीयन्ते (बादरी-मतवत्), नापि केवलं परब्रह्मोपासका एव (जैमिनि-मतवत्)। उभयथाप्येकतरपक्षग्रहणे श्रुतिविरोधरूपो दोषः प्रसज्येत। अतः ये नामादिप्रतीकेषु ब्रह्मदृष्ट्या उपासनं कुर्वन्ति (प्रतीकालम्बनाः), तान् विहाय, ये साक्षात् परब्रह्म वा तदात्मकतया स्वात्मानमुपासते (अप्रतीकालम्बनाः), तान् सर्वानपि अमानवः पुरुषो नयति। "तं यथा यथोपासते तदेव भवति" इति तत्क्रतुन्यायबलात् प्रतीकोपासकानां परिच्छिन्नफलत्वादर्चिरादिगतिर्न सिध्यति, अप्रतीकोपासकानामेव तु सा सिध्यतीति सिद्धान्तः।