भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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अधिकरण-प्रसङ्ग एवं विषय-प्रवेश (ब्रह्मसूत्र ४.४ - मुक्तात्म-सर्वज्ञत्व-विचार): श्रुति-वाक्य १: वाङ् मनसि सम्पद्यते (छान्दोग्योपनिषद् ६.८.६) अनुवाद: "मरणकाल में वाक् (वाणी) मन में लीन/सम्पन्न हो जाती है।" भाष्य/विवरण: इस प्रकार श्रुति-शास्त्र सुषुप्ति (गाढ़ निद्रा) तथा मरणकाल की चेतनावस्था का निरूपण करता है। तथापि, श्रुति-शास्त्र यह भी प्रतिपादित करता है कि मुक्तावस्था में जीवात्मा सर्वज्ञ (सर्वविषयक ज्ञान से सम्पन्न) होता है। पूर्वपक्ष/सुषुप्ति-दशा-निरूपक श्रुति: सुषुप्ति की अवस्था छान्दोग्योपनिषद् (८.११.१) के वचनों में इस प्रकार वर्णित है— श्रुति-वाक्य २: नाहं खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमिवापीतो भवति। नाहमत्र भोग्यं पश्यामि॥ अनुवाद: "सुषुप्ति-अवस्था में यह जीवात्मा इस समय न तो स्वयं को जानता है कि 'मैं यह हूँ' और न ही इन भूतों (पदार्थों) को जानता है। वह मानो विनाश (अभाव) को ही प्राप्त हो जाता है। अतः मैं इस अवस्था में कोई श्रेय अथवा भोग नहीं देखता।" सिद्धान्त/मुक्तावस्था-निरूपक श्रुति: इसके विपरीत, मुक्त आत्मा का स्वरूप छान्दोग्योपनिषद् (८.१२.५) में इस प्रकार उल्लिखित है— श्रुति-वाक्य ३: स वा एष एतेन दिव्येन चक्षुषा मनस्येतान् कामान् पश्यन् रमते य एते ब्रह्मलोके॥ अनुवाद: "वह मुक्त आत्मा इस दिव्य चक्षु-स्वरूप मन के द्वारा ब्रह्मलोक में स्थित इन समस्त दिव्य भोगों/संकल्पों को देखता हुआ आनन्दपूर्वक रमण करता है।" मूर्च्छा/उत्क्रान्ति-दशा-निरूपक श्रुति (बृहदारण्यकोपनिषद् २.४.१२ / ४.५.१३): मरण-मूर्च्छा का निरूपण इन वचनों में किया गया है— श्रुति-वाक्य ४: एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति। अनुवाद: "इन भौतिक भूत-मात्राओं से उत्थान करके (शरीर से निकलकर) वह जीवात्मा इनके ही साथ विनष्ट (विशेष संज्ञा से रहित) सा प्रतीत होता है।" पदार्थ-निर्वचन एवं उपसंहार: यहाँ 'विनश्यति' शब्द का अर्थ वास्तविक विनाश (स्वरूप-नाश) नहीं, अपितु 'अदर्शन' अर्थात् 'वह बाह्य विषयों को नहीं देख पाता' (विशेषसंज्ञा-अभाव) है। इस प्रकार श्रुति-तात्पर्य से यह सिद्ध होता है कि मुक्त आत्मा ज्ञान-संकोच से रहित होकर सर्वज्ञ होता है।