गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीब्रह्मसूत्रम् ॥ ॥ चतुर्थोऽध्यायः — चतुर्थः पादः ॥ (पूर्वानुवृत्तिः — सूत्र २१ का भाष्य-उपसंहार) श्रुति-वचनम्: "सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति।" (तैत्तिरीयोपनिषद् २।१।१) हिन्दी अनुवाद: "मुक्त जीवात्मा सर्वज्ञ परब्रह्म के साथ समस्त दिव्य आनन्दों का उपभोग करता है।" भाष्य-विवरणम्: उपनिषद् का यह कथन कि मुक्त आत्मा भगवान् के तुल्य है, केवल दिव्य आनन्द के भोग के विषय में ही लागू होता है। स्वरूप अथवा ऐश्वर्य की दृष्टि से मुक्त आत्मा कभी भी परमेश्वर के समान नहीं हो सकता, यही इसका वास्तविक अर्थ है। यह आक्षेप पूर्व में ही सूत्र २।३।१९ में निरस्त किया जा चुका है। इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि परमेश्वर और व्यष्टि जीवात्मा की समानता केवल भोग-मात्र में है, उनके स्वरूप भिन्न हैं और यह भेद सर्वथा नित्य एवं सत्य है। ॥ एकादशम् अनावृत्यधिकरणम् ॥ अधिकरण ११: मुक्तात्मा का पुनः संसार में न लौटना श्रीमद्बलदेवविद्याभूषणविरचित-गोविन्दभाष्यावतरणिका: अब यह प्रतिपादित किया जाता है कि मुक्त जीवात्मा नित्य काल तक परम पुरुषोत्तम भगवान् के सान्निध्य में ही निवास करता है। विषयः: परमेश्वर के परम धाम में मुक्त जीवों के प्रवेश का निरूपण करने वाले समस्त शास्त्र-वचन यहाँ विचार के विषय हैं। संशयः: क्या मुक्त आत्मा आध्यात्मिक जगत् में नित्य निवास करता है अथवा वहाँ से उसकी कभी पुनरावृत्ति होती है? पूर्वपक्षः: पूर्वपक्षी का कथन है कि आध्यात्मिक जगत् (भगवद्धाम) भी स्वर्गलोक आदि लोकों के समान ही एक स्थान है। जैसे स्वर्गलोक से पुण्य क्षीण होने पर जीव का पतन हो जाता है, वैसे ही भगवद्धाम से भी जीव का पतन सम्भव है। अतः मुक्त आत्मा अनिवार्यतः नित्य काल तक आध्यात्मिक जगत् में स्थित नहीं रहता। सिद्धान्तः: इस पूर्वपक्ष का निराकरण करते हुए सूत्रकार भगवान् बादरायण अपना अन्तिम सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं— ॥ सूत्रम् २२ ॥ अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ॥ ४।४।२२ ॥ पदच्छेदः: अनावृत्तिः, शब्दात्, अनावृत्तिः, शब्दात्। सूत्रार्थः: शास्त्र-प्रमाण (शब्द) के आधार पर मुक्त जीवों की संसार में पुनरावृत्ति नहीं होती; शास्त्र-प्रमाण के आधार पर उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। (अध्याय तथा शास्त्र की समाप्ति सूचित करने के लिए पद की द्विरुक्ति की गई है।)