भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

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अत्ताधिकरणम् संशयः अत्ता कः? किमग्निः, उत जीवः, अथवा परमपुरुषः परमेश्वरः? पूर्वपक्षः अत्र विशेषहेतोरभावादग्निरत्ता स्यात्, प्रश्नप्रतिवचनयोस्तथैवोपलम्भात्। "अग्निरन्नादः" (बृहदारण्यकोपनिषत् १.४.६) इति श्रुतेरग्निरैवात्ता भवितुमर्हति। अथवा जीव एवात्ता स्यात्, यतो हि भोक्तृत्वं क्रियारूपं भवति, जीवाश्च कर्मफलं भुञ्जते, ईश्वरस्तु अकर्ता अभोक्ता च वर्तते। श्रुतिश्च तयोर्भेदं दर्शयति— "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥" (मुण्डकोपनिषत् ३.१.१, कठोपनिषत् ३.१)। तस्मात् जीव एवात्ता इति पूर्वपक्षे प्राप्ते ब्रूमः— सिद्धान्तः सूत्रम् ९ अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १।२।९ ॥ पदच्छेदः अत्ता, चराचर-ग्रहणात्। पदार्थः अत्ता = सर्वस्य भोक्ता संहर्ता (परब्रह्म); चराचर-ग्रहणात् = चराचरात्मकस्य सर्वस्य प्रपञ्चस्य संहार्यत्वेन ग्रहणात्। सूत्रार्थः अत्ता परमेश्वर एव, यतः स्थावर-जङ्गमात्मकं कृत्स्नं जगत् तस्य भोजनरूपेण (संहर्तव्यत्वेन) गृह्यते। श्रील-बलदेवविद्याभूषण-विरचितं गोविन्दभाष्यम् अत्ता परमपुरुष एवात्र ग्राह्यः। कुतः? "चराचरग्रहणात्"। कठवल्ल्यन्ते श्रूयते—"यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः॥" (कठोपनिषत् १.२.२५)। अत्र ब्रह्मक्षत्रशब्देन कृत्स्नं चराचरं जगत् ओदनत्वेन निर्दिश्यते, मृत्युश्चोपसेचनत्वेन। उपसेचनं नाम यत् स्वयं भुज्यमानं सद् अन्यस्यापि भोजनहेतुर्भवति। कृत्स्नस्य प्रपञ्चस्य मृत्यूपसिक्तस्य संहारलक्षणं भक्षणं परमेश्वरं विना नान्यस्य सम्भवति। अतो जगत्प्रलयकर्ता परमेश्वर एवात्रात्ता। न च "अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति" इति श्रुतिविरोधः, तस्याः कर्मफलभोगनिषेधपरत्वात्, परमेश्वरस्य प्राकृतकर्मफलाशनाभावेऽपि संहाराख्यमदनीयमत्तृत्वं स्वाभाविकमेवेति सिद्धम्। हिन्दी-अनुवाद एवं व्याख्या संशय: प्रस्तुत प्रसंग में 'अत्ता' (भक्षण करने वाला) कौन है? क्या वह अग्नि है, जीव है, अथवा परब्रह्म परमेश्वर? पूर्वपक्ष: कोई स्पष्ट विनियामक न होने से तथा बृहदारण्यक उपनिषद् (१.४.६) में "अग्निरन्नादः" (अग्नि अन्न खाने वाला है) कहे जाने से अग्नि ही अत्ता है। अथवा जीव ही अत्ता है, क्योंकि खाना एक कर्म है और मुण्डकोपनिषद् (३.१.१) तथा कठोपनिषद् (३.१) के अनुसार दो सखा पक्षियों में से एक (जीव) कर्मफल रूपी पिप्पल खाता है और दूसरा (ईश्वर) केवल साक्षी रहता है। सिद्धान्त: सूत्र ९: अत्ता चराचरग्रहणात् (१.२.९) भावार्थ: अत्ता परमेश्वर ही है, क्योंकि यहाँ सम्पूर्ण चराचर (चर और अचर जगत) का संहार रूपी भोजन के रूप में ग्रहण हुआ है। श्रील बलदेव विद्याभूषण के तात्पर्य का अनुवाद: कठोपनिषद् (१.२.२५) में कहा गया है—"जिसके लिए ब्रह्म और क्षत्रिय दोनों भात (ओदन) हैं तथा मृत्यु जिसका उपसेचन (शाक/व्यंजन) है, वह परमात्मा जहाँ है उसे इस प्रकार यथार्थतः कौन जान सकता है?" यहाँ ब्रह्म और क्षत्र समग्र ब्रह्माण्ड के उपलक्षक हैं। मृत्यु रूपी उपसेचन से युक्त सम्पूर्ण विश्व का संहार-रूपी ग्रास परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कर सकता। "अनश्नन्" (न खाता हुआ) इत्यादि श्रुति केवल जीव के प्राकृत कर्मफल-भोग का ईश्वर में निषेध करती है, उसके अलौकिक सर्वसंहारक अत्तृत्व का नहीं।