भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

॥ श्रीमद्ब्रह्मसूत्रम् ॥ प्रथमाध्याये द्वितीयः पादः (अन्तर्याम्यधिकरणम् — अधि० ६, सूत्र १८) श्रुति-विषयवाक्यम् (बृहदारण्यकोपनिषद् ३.७.३) — "यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरः, यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरम्, यः पृथिवीमन्तरो यमयति, एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥" विषयवाक्य का हिन्दी अनुवाद — "जो पृथ्वी में स्थित रहकर भी पृथ्वी के भीतर रहता है, जिसे पृथ्वी नहीं जानती, पृथ्वी जिसका शरीर है, तथा जो भीतर रहकर पृथ्वी का नियमन करता है; वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी और अमृतस्वरूप परमात्मा है।" संशयः — इस श्रुति-वचन में पृथ्वी आदि के भीतर रहने वाला तथा उनका नियन्ता कहा गया 'अन्तर्यामी' प्रधान (प्रकृति) है, जीव है अथवा श्रीभगवान् (परमेश्वर)? पूर्वपक्षः — यहाँ अन्तर्यामी 'प्रधान' (प्रकृति) होना चाहिए; क्योंकि प्रधान पृथ्वी आदि समस्त विकारों का उपादान कारण होने से उनके भीतर अनुस्यूत रहता है। कार्य में कारण ही नियन्ता रूप से प्रविष्ट होता है। अतः प्रधान ही पृथ्वी का नियन्ता है। सर्वव्यापक होने से इसे 'आत्मा' और नित्य होने से 'अमृत' कहा गया है। अथवा यहाँ अन्तर्यामी कोई सिद्ध 'जीव' (योगी) हो सकता है; क्योंकि योगबल से सूक्ष्म होकर सर्वत्र प्रविष्ट होना और अदृश्य रहना योगी के लिए सम्भव है। अतः प्रत्यक्ष अर्थ में 'आत्मा' और 'अमृत' शब्द जीव पर ही घटित होते हैं। इस प्रकार अन्तर्यामी या तो प्रधान है अथवा कोई जीव। सिद्धान्तः — इस पूर्वपक्ष का समाधान करते हुए भगवान् बादरायण अग्रिम सूत्र प्रस्तुत करते हैं — सूत्रम् १८ — अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १।२।१८ ॥ पदच्छेदः — अन्तर्यामी, अधिदैवादिषु, तद्धर्मव्यपदेशात्। पद-विभाग एवं शब्दार्थ — अन्तर्यामी = सर्वान्तर्यामी (परमेश्वर ही है); अधिदैवादिषु = आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक आदि समस्त स्थानों में; तद्धर्मव्यपदेशात् = उसके (परमेश्वर के ही) असाधारण धर्मों का कथन होने से। सूत्रार्थ (हिन्दी अनुवाद) — अधिदैव आदि समस्त तत्त्वों में स्थित जो 'अन्तर्यामी' है, वह परमेश्वर ही है; क्योंकि इस प्रकरण में उसी परमेश्वर के धर्मों का कथन किया गया है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्यम् — बृहदारण्यकोपनिषदि यः पृथिव्यादिषु अन्तर्यामी निर्दिष्टः, स साक्षात् श्रीभगवान् पुरुषोत्तम एव। कुतः? 'तद्धर्मव्यपदेशात्'—तस्यैव परमेश्वरस्य धर्माणां व्यपदेशात् प्रतिपादनात्। अत्र पृथिव्यादि-समस्त-प्रकृत्यन्तर्वर्तित्वम्, तैश्चाविज्ञेयत्वम्, सर्वाध्यक्षत्वम्, सर्वव्यापकत्वम्, सर्वज्ञत्वम्, आनन्दमयत्वम्, अमृतत्वं च परब्रह्मण एव असाधारणाः धर्माः निर्दिश्यन्ते। गोविन्दभाष्य-भावार्थ एवं व्याख्या — बृहदारण्यक उपनिषद् के इस संदर्भ में वर्णित अन्तर्यामी स्वयं परम पुरुष भगवान् ही हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि सूत्र कहता है—'तद्धर्मव्यपदेशात्' अर्थात् उस परमेश्वर के ही स्वाभाविक धर्मों का यहाँ निरूपण हुआ है। यहाँ जो लक्षण बताए गए हैं—जैसे पृथ्वी आदि समस्त जड़ तत्त्वों के भीतर अधिष्ठित रहना, उन तत्त्वों द्वारा अज्ञेय होना, सम्पूर्ण जगत् का एकच्छत्र परम नियन्ता होना, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, परम आनन्दमय और अमृतस्वरूप होना— ये सभी दिव्य धर्म केवल परमब्रह्म परमात्मा के ही हैं, वे न तो जड़ प्रधान (प्रकृति) में सम्भव हैं और न ही परिच्छिन्न जीव में।