भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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सूत्र २३ रूपोपन्यासाच्च ॥ २३ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: रूप — रूप का; उपन्यासात् — उल्लेख (प्रतिपादन) होने से; च — भी। सूत्रार्थ: और (श्रुति में उस अक्षर के) दिव्य रूप का उल्लेख होने के कारण भी (वह केवल परमात्मा ही है)। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्द-भाष्य (तात्पर्य): मुण्डक उपनिषद् (३.१.३) में कहा गया है: यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ "जब साधक (द्रष्टा) उस सुवर्ण के समान कान्तिमान्, जगत् के कर्ता, नियन्ता (ईश), परम पुरुष तथा ब्रह्म (प्रकृति अथवा हिरण्यगर्भ) के मूल कारण परमात्मा का साक्षात् दर्शन करता है, तब वह ज्ञानी पुरुष पुण्य एवं पाप दोनों कर्म-बन्धनों को भस्म कर, निर्मल होकर परम समता (परम पद) को प्राप्त होता है।" क्योंकि यहाँ 'अक्षर' के रूप को समस्त कारणों के मूल कारण के रूप में इस प्रकार निरूपित किया गया है, अतः यहाँ 'अक्षर' का रूप केवल श्रीभगवान् (परम पुरुष) ही हो सकता है। यह 'अक्षर' न तो प्रधान (प्रकृति) हो सकता है और न ही बद्ध/मुक्त जीव। सूत्र २४ प्रकरणात् ॥ २४ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: प्रकरणात् — प्रसंगवश / समग्र प्रकरण होने के कारण। सूत्रार्थ: प्रसंग (प्रकरण) के कारण भी (यहाँ 'अक्षर' शब्द से केवल परमेश्वर ही विवक्षित हैं)। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्द-भाष्य (तात्पर्य):