भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

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जगत् वैश्वानर के शरीर के अन्य अंग हैं।" इसके अतिरिक्त, शतपथ- ब्राह्मण (१०.६.१.११) कहता है—"स यो ह्येतमेवाग्निं वैश्वानरं पुरुषविधं पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं वेद" (वह इस पुरुष-रूपी वैश्वानर अग्नि को जानता है जो जीवों के हृदय में स्थित है)। यदि 'वैश्वानर' शब्द का अर्थ केवल "अग्नि" किया जाए, तो यहाँ यह व्याख्या कि वैश्वानर जीवों के हृदय में निवास करता है, स्वीकार की जा सकती है, किन्तु यह कथन नहीं कि वैश्वानर पुरुष-रूपी (मानवाकार) है। यदि वैश्वानर का अर्थ भगवान् विष्णु किया जाए, तो ये दोनों ही कथन सुगमता से स्वीकार्य हो जाते हैं। इसके अनन्तर वे इस विचार का निराकरण करते हैं कि वैश्वानर का अर्थ अग्नि-देवता अथवा अग्नि-भूत (भौतिक तत्त्व) है। ॥ सूत्र २८ ॥ अत एव न देवता भूतं च ॥ २८ ॥ अतः एव — अतएव (पूर्वोक्त कारणों से ही); न — नहीं; देवता — अग्नि-देवता; भूतम् — भूताग्नि (अग्नि-तत्त्व); च — और; इन्हीं कारणों से "वैश्वानर" न तो अग्नि-देवता है और न ही भौतिक तत्त्व रूप अग्नि। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित भाष्य (तात्पर्य) : पूर्वपक्षी का आक्षेप हो सकता है: अग्नि-देवता के अत्यन्त सामर्थ्यवान् एवं महान् होने के कारण यह कहा जा सकता है कि द्युलोक उनका सिर है तथा (जगत् के अन्य भाग उनके शरीर के अंग हैं), और यही बात अग्नि-तत्त्व के विषय में भी कही जा सकती है। ऐसा ऋग्वेद (१०.८८.३) के इस वर्णन के कारण है: "यो भानुना पृथिवीं द्याम् उतेमामाततान रोदसी अन्तरिक्षम्" (सूर्य रूप में अग्नि ने पृथिवी, द्युलोक तथा दोनों के मध्य स्थित सम्पूर्ण अन्तरिक्ष को व्याप्त किया है)। यद्यपि ऐसा कहा जाए, फिर भी हम 'न' (नहीं) कहते हैं। क्यों? सूत्र कहता है "अत एव" (इसी कारण से), जिसका अर्थ है "पूर्वोक्त हेतुओं के आधार पर वैश्वानर न तो अग्नि-देवता है और न ही अग्नि-तत्त्व।" ऋग्वेद के इस मन्त्र के शब्द केवल स्तुति (प्रशंसा) मात्र हैं। अवतरणिका : महर्षि जैमिनि के मत में 'अग्नि' शब्द भी साक्षात् "परम पुरुषोत्तम भगवान्" का ही वाचक है, ठीक वैसे ही जैसे 'वैश्वानर' शब्द। ॥ सूत्र २९ ॥ साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ २९ ॥