हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ हम्मीररासो नर नारि लखैं उर प्रीति पगी ॥ ११६ ॥ ऋषि पास त्रिया सर न्हान रच्यौ । जल केलि अनेक१ प्रकार मच्यौ ॥ बिन चीर अधीर लखै नर वै । कुच पीन नितंब सुकाँम तबै ॥ १२० ॥ कबरी छुटि नागनि सी दरसै । सुर संग भ्रमै रस सों सरसै ॥ ऋषिराज महा उर धीर अयं । रितु सारद हारि सुजात रयं ॥ १२१ ॥ दोहरा छंद हारि मानि सारद् गइय, उठि हेमंत सकोपि । महासीत प्रगटिय जगत, सवै लाज तजि लोपि ॥ १२२ ॥ हेमंत ऋतु वर्णन छप्पय छंद तब सुहेम करि कोप सीत अति जगत प्रकास्यौ । बिखम तुषार अपार मार उपचार सुभास्यौ२ ॥ कंपत ३ चैतन रूप कहा जर जरत समूरे । तिय हिय लगि लगि बचन चरत मुख सैन सरूरे ॥ तिहिं समय जीव सब जगत के भए इक्क नर नारि सब । उरबसी आय ऋषि निकट तँक४ हिये लाय मौंहिं५ सरन६ अब ॥१२३॥ दोहरा छंद खुली न कठिन समाधि ऋषि, चली हिमंत सुहारि । सिसिर परस मन बरनि करि, उठी सुकाँम जुहारि ॥१२४॥ १ अपुब्ब । २ सुभाष्यौ । ३ नचौ । ४ तैं,लौं । ५ मुहिं । ६ सरनि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri