भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 258 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

तृतीय संस्करण का वक्तव्य सभा द्वारा जोधराजकृत 'हम्मीररासो' का प्रथम संस्करण संवत् १९६५ मेंँ प्रकाशित हुआ था। उसमेंँ मूल के अतिरिक्त पादटिप्पणी मेंँ कुछ पाठांतर भी दिए गए थे। ग्रंथ किस हस्तलेख के आधार पर संपादित किया गया और पाठांतर देने मेंँ किस दूसरे हस्तलेख से सहायता ली गई इसका उल्लेख ग्रंथ के संपादक स्वर्गीय बाबू श्यामसुंदरदास जी ने अपनी भूमिका मेंँ नहींँ किया है। वहाँँ इतना ही संकेत है कि कुँवर कृष्णसिंह जी वर्मा से यह काव्य प्राप्त हुआ था। 'खोज' मेंँ हम्मीररासो का कोई हस्तलेख आज तक नहींँ मिला। सभा के आर्यभाषा-पुस्तकालय मेंँ अलवत एक आधु- निक हस्तलेख है जो सं० १८६४ की 'असल प्रति' की अनुलिपि है और संवत् १६६१ मेंँ प्रस्तुत हुआ है। सभा से हम्मीररासो का प्रथम संस्करण इस अनुलिपि के चार वर्ष बाद प्रकाशित हुआ। अतः उसके संपादन के लिये ही कदाचित् यह अनुलिपि कराई गई होगी और इसका उपयोग भी किया गया होगा। फिर भी इस अनुलिपि मेंँ अनेक पाठांतर मिलते हैं और एकाध स्थल पर कुछ पंक्तियाँ भी अधिक हैं। इसमेंँ दो पृष्ठ (१७५-१७६) नहींँ है, पूरी अनु- लिपि १७६ पृष्ठोंँ मेंँ समाप्त हुई है। प्रथम संस्करण मेंँ एकरूपता नहींँ थी। कुछ ऐसे कठिन शब्द भी थे जिनका अर्थ देना आवश्यक जान पड़ा। अतः इस संस्करण (तृतीय आवृत्ति) मेंँ यह पूर्ति कर दी गई है। यह कार्य बहुत मनो- योगपूर्वक संपन्न किया है 'नागरीप्रचारिणी पत्रिका' के सहायक संपादक श्री शिवनाथ, एम्० ए० ने जो नई पीढ़ी के अच्छे आलोचक हैं। जोधराज ने यह ग्रंथ सं० १७८५ मेंँ प्रस्तुत किया था। यह हिंदी- साहित्य का रीतिकाल या शृंगारकाल था। 'रासो' ग्रंथोँ की परंपरा अपभ्रंशकाल की है। जैन अपभ्रंश मेंँ 'रास' नाम के अनेक