हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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और 'म' के पूर्व का आकार प्रायः सानुनासिक ही रखा गया है, जैसे धाँव, बाँम आदि मे । क्रियापदों, कृदंतों, विभक्ति-चिह्नों मेँ ओका- रांत, औकारांत दोनों का घालमेल है । इसका कारण यह है कि काव्यभाषा 'ब्रज' का उच्चारण ऐसे मध्यस्थल का उच्चारण है जिसके पश्चिम ओ की प्रवृत्ति है और जिसके पूर्व औ की । विचार करने पर दिखाई देता है कि इसका प्रभाव भिन्न भिन्न शब्दों पर पृथक् पृथक् पड़ा है । क्रियापदों में तो औकार की ओर झुकाव है पर संज्ञा-शब्दों में आकार की ओर । अनुलिपि से संगत बैठाते हुए इसी नियम का पालन किया गया है । 'रासा' ग्रंथों में राजस्थानी के प्रभाव के कारण 'व'-बहुला और 'ण'-बहुला प्रवृत्ति है । इनमें से 'व' की प्रवृत्ति ब्रज के अनुकूल नहीं है इससे उसमें यथास्थान 'ब' का ही व्यवहार किया गया है, पर 'ण' रहने दिया गया है—पारंपरिक रूपों के ग्रहण का विचार करके । विभिन्न प्रदेशों, समयों, कवियों, उपभाषाओं के प्राचीन ग्रंथों के संपादन में कैसी 'वर्तनी' रखी जाय इसका विस्तृत विवेचन अपेक्षित है और इसपर स्वतंत्र निबंध क्या पुस्तिका लिखने की आव- श्यकता है । खोज-विभाग के प्राचीन हस्तलेखों का आलोडन और विवरणों के अनुशीलन से पता चलता है कि पूरबी, पछाहों आदि कई शैलियाँ हैं । इसका अनुसंधान अपेक्षित है । अतः प्रस्तुत संस्करण में एकरूपता लाने के लिये जिस वर्तनी का व्यवहार किया गया है उसका विस्तार करने की यहाँ कोई विशेष आवश्यकता नहीं । यह संस्करण संपादन की थोड़ी सामग्री के होते हुए भी जहाँ तक हो सका है उपयोगी बना दिया गया है । द्वितीय आवृत्ति बहुत दिनों पूर्व समाप्त हो गई थी । इस आवृत्ति के प्रकाशित होने में कुछ देर सुसंपादन के कारण ही हुई है । आशा है कि यह संस्करण विशेष लाभदायक प्रतीत होगा । वासंतिक नवरात्र } विश्वनाथप्रसाद मिश्र सं० २००५ वि० } ( साहित्य-मंत्री )