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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

( २ )

दे देना उचित समझता हूँ। इस सारांश के लिये, जो आगे दिया जाता है, मैं कुँवर कन्हैया जी का अनुगृहीत हूँ। भारतवर्ष के अंतिम सम्राट् भृगु¹ कुलोत्पन्न महाराज पृथ्वीराज के वंश में चंद्रभान नाम का एक वीर पुरुष था। यद्यपि नीमराणा अब एक छोटी सी रियासत अलवर राज्य के अंतर्गत है, पर यहाँ के अधिपति चौहानों के मुकुटमणि माने जाते हैं। ये राजा अपने को महाराज पृथ्वीराज का वंशधर बताते हैं। महाराज चंद्रभान को उनके वीरत्व, दातृत्व, औदार्य्य, पराक्रम, बुद्धिमत्ता और सर्वप्रियता के कारण लोग राठ² का महाराज कहा करते थे, और सब लोग उसी भाँति उसका आदर भी करते थे। उक्त चंद्रभान के दरबार में आदि गौड़-कुलोत्पन्न अत्रिगोत्रीय ब्राह्मण, बालकृष्ण का पुत्र जोध- राज था। इस वंश के लोग डिडवरिया राव कहे जाते थे। एक समय चंद्रभान ने जोधराज से हम्मीररासो के सुनने की इच्छा प्रकट की और कहा कि इस काव्य में महाराज हम्मीर की वंशावली, उनका अलाउद्दीन से वैर, उनकी वीरता और उनके युद्ध- कौशल इत्यादि का यथाक्रम संक्षेप में वर्णन होना चाहिए। तब जोधराज ने इस काव्य “हम्मीर रासो” की रचना की। सृष्टिरचना—प्रथम कल्प के आदि में संसार रूपी उपवन के जीव-निर्जीव, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सब पदार्थ वीर्य्यस्वरूप से उस परम प्रभु परमात्मा अनादि जगदीश्वर के स्वरूप में स्थित थे और वह प्रभु योगनिद्रा में निमग्न था। एक समय वह अपनी शक्ति का आप ज्ञान करके निद्रा से उठा और उसके इच्छा करते ही माया उत्पन्न


१ चहुआनों के भृगुवंशी होने का वर्णन आगे इसी पुस्तक में है। २ पुस्तक में मूल पाठ "राठ पतिशाह" है जिसका अर्थ "राठ का बादशाह" होता है। 'राठ' उस भूभाग का नाम है जो अलवर और जयपुर राज्य के बीच में है और जहाँ नीमराणा राज्य स्थित है।