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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

( १५ )

लिये शरणागत को त्यागकर अपने कुल में मैं कलंक नहीं लगाना चाहता । तुझे कितना दर्प है जो अपने सामने दूसरे को वीर नहीं गिनता । इस पृथ्वी पर रावण, मेघनाद सरीखे अभिमानी और अतुल बलशाली वीर पानी के बबूले की तरह बिला गए । यवनराज ! मनुष्य नहीं रहता, परंतु उसके कर्त्तव्य की कहानियाँ अवश्य रहती हैं । अतएव अब तुझे जो सूझे सो कर । मैं भी सब तरह से तैयार हूँ ।” अलाउद्दीन के दूत को इस प्रकार उत्तर देकर राव हम्मीर जी शिवालय मे जाकर शिवार्चन करने लगे। धूप, दीप नैवेद्य संयुक्त विधिवत् पूजा करके जिस समय राव जी ध्यानमग्न थे उसी उसो समय शिवालय में आकाशवाणी हुई कि हे हम्मीर तुमसे और अला- उद्दीन से १२ वर्ष पर्य्यंत संग्राम होगा । तत्पश्चात् आषाढ़ सुदी ११ को तुम्हारा शाका पूर्ण होगा जिससे संसार में चिरकाल तक तुम्हारा यश बना रहेगा । शिव जी से इस प्रकार वरदान पाकर राव जी ने प्रसन्न होकर अपने समस्त शूर वीर सरदारों को युद्ध के लिये सन्नद्ध होने की आज्ञा दी । उसी समय हम्मीर के चाचा राव रणधीर ने, जो कि “छाड़गढ़” के किले के स्वामी थे, हम्मीर से कहा कि श्रीमान् क्षमा करें इस समय मेरे हाथ देखें । इधर हम्मीर जी का पत्र पाते ही अलाउद्दीन लाल पीला सा हो उठा और उसने उसी समय रणथंभ के किले पर चारों ओर से गोले और बाणों की वर्षा करने की आज्ञा दी । बादशाह की आज्ञा पाते ही मुसलमान सेनानायक मुहम्मद अली रणथंभ के अजेय दुर्ग को पाने के लिये प्रयत्न करने लगा । इधर से राव रणधीर ने भी किले की बुर्जी पर से अग्निवर्षा करने की आज्ञा दी और आप कुछ सैनिकों सहित मुसलमानी सेना में वह इस प्रकार धँस पड़ा जैसे भेड़ों के समूह में भेड़िया धँसता है । निदान पहली वरणी राव रणधीर और मुहम्मद अली की हुई जिसे राव जी ने एक ही हाथ में दो कर दिया । यह देखकर उसका पीठ-नायक अजमत खाँ राव जी के