हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) शरीर पर झिलम-बख्तर, हाथों में दस्ताने, और यथा अंग छत्तीसों बाने सजे हुए थे। वे वीर योद्धा लोग साक्षात् शिव के गण से सुशो- भित होते थे। इधर तो इन सब शूर वीरों सहित राव जी गणेश, शिव, भगवती इत्यादि देवताओं का पूजन और परिक्रमा कर रहे थे उधर राजमहल के द्वार पर मेघ के समान बड़े दुरद दंतारे मत्तवारे हाथियों और वायु के वेग को उल्लंघन करनेवाले घोड़ों का घमासान जम रहा था। सूर्य निकलते निकलते राव हम्मीर जी अपने वीर योद्धाओं सहित इष्टदेव का स्मरण करते हुए राजमहल से बाहर हुए। राव जी के आते ही सब सेना व्यूहबद्ध हो गई। सबसे आगे फड़वाली साक्षात् काल की सी बिकराल कालिका का अवतार तोपें, उनके पीछे हथनार ऊँटनार जंबूर, तिनके पीछे हाथी, तिनके पीछे ऊँट, घड़मवार और फिर तुबकदार पैदल इत्यादि थे। उस समय बाल सूर्य की सुनहरी किरणों के पड़ने से सब साज बाज मे सुसज्जित चंचल घोड़े और गंधमय गंडस्थलवाले मतवाले हाथी बड़े ही भले मालूम होते थे। जिस समय राव जी की सवारी संपूर्ण रूप से सुसज्जित हो गई तो नौबत, नगाड़े, शंख, सहनाई, रणतूर, श्रृंगी, डफ इत्यादि रण-वाद्य बजने लगे, कड़खैत उच्च स्वर मे कड़खे गा-गाकर महज कठोरहृदय शूर वीरों के चित्त को उत्कर्ष देने लगे। इधर ये शूर वीर लोग उमंग में भरे हुए आगे बढ़ते जाते थे उधर आकाश में अप्सराओं के वृंद इस समर में शत्रु के संमुख प्राण को परित्याग करनेवाले वीरों को अपने हृदय का हार बनाने के लिये आकाश मार्ग से आ रही थीं। जिस प्रकार ये वीर लोग इधर झिलम, टोप, बख्तर, दस्ताने, कलगी, तुर्रा, सरपेच, तीर, तुबक, तेगा, तलवार, तबल, तोमर, तौरा नेत, बरछी, बिछुआ, बाँका, छुरी, पिस्तौल, पेश- कब्ज, कटार, परिघ, फरसा, दाब इत्यादि अस्त्र शस्त्र से सजे हुए थे उसी प्रकार उस तरफ सर्वांगसुंदरी नवयौवना अप्सराएँ भी सीसफूल, दावनी, आड़, ताटंक, हार, बाजूबंद, जोसन, पहुँची, पाजेब इत्यादि गहने और नाना प्रकार की रंग बिरंगी कंचुकी, चोली, चौबंद