हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ )
के २०० सवार, तीस हाथी और ६०० वीर जोधा काम आ चुके तब शेख महिमाशाह ने राव हम्मीर को सिर नवाकर कहा कि श्रीमान् अब बहुत हुआ। अब जरा मेरा भी पराक्रम देखिए। यह कहता हुआ वह बीच समरभूमि में आ खड़ा हुआ और बादशाह को संबोधन करके बोला—मैं महिमाशाह जो आपका अपराधी हूँ यह खड़ा हूँ अब पकड़ते क्यों नहीं ! अथवा जो कुछ करना हो करते क्यों नहीं ? अब अपनी इच्छा को पूर्ण कीजिए। महिमाशाह के ऐसे सगर्व वचन सुनकर अलाउद्दीन ने खुरासान खाँ की ओर देखकर कहा कि जो कोई इस शेख को जीवित पकड़ लावेगा उसे तीस हजार की जागीर, बारह हजारी मंसब, नौबत निशान और एक तलवार दूँगा। इस पर सड़की फौज के साथ इधर से खुरासान खाँ और राव हम्मीर की जय जयकार बोलते हुए उधर से महिमाशाह ने एक दूसरे पर आक्रमण किया। बादशाह ने अपनी सेना को उत्तेजित करने के लिये कहा इसको शीघ्र पकड़ो। शेख और खुरासान की सेना अनी तो एक दूसरे पर बाणों की वर्षा करने लगी और इधर ये दोनों वीर स्वयं आमने सामने जुटकर एक मात्र खङ्ग के सहारे पर खेलने लगे। अंत में महिमाशाह ने खुरासान खाँ को मार गिराया और उसके निशान इत्यादि ले जाकर राव जी को नजर किए। महिमाशाह ने राव हम्मीर जी के संमुख खड़े होकर कहा—हे शरणागत प्रणरक्षक वीर चहुआन, आपको धन्य है। आप राज्य, परिवार, स्त्री और सब राजसी वैभवों को तिलांजलि देकर जो एक मात्र मेरी रक्षा करने के लिये अपने हठ से न हटे यह अचल कीर्ति आपकी इस संसार में सनातन स्थिर रहेगी। उसने आँसू भर कहा—“हाय ! अब वह समय कब आवेगा कि मैं पुनः अपनी माता के गर्भ से जन्म धारण कर आपसे फिर मिलूँ।” यह सुनकर राव जी ने कहा हे वीर मीर, अधीर मत हो। जीवन मरण यह संसार का काम ही है इस विषय का पश्चात्ताप ही क्या ? फिर हम तुम तो एक ही अंश के अवतार हैं तो हम आप अवश्य एक ही