हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें.( ३३ ) पति वादशाह है। अदंड्य है। इसलिये आप लोग इसे यों ही छोड़ दीजिए। निदान राजपूत सरदारों ने राव जी की आज्ञा मानकर अलाउद्दीन को उसकी सेना में पहुँचा दिया और वह भी उसी समय वहाँ से कूचकर दिल्ली को चला आया। उधर राव हम्मीर जी ने अपने घायलों को उठवाकर और बाद- शाही सेना से छीने हुए निशान लिवाकर निज दुर्ग की तरफ फेरा किया। राव जी ने भूलवश, अथवा विजय के उत्साहवश, शाही निशानों को आगे चलने की आज्ञा दी, यह देखकर रानी जी ने समझा कि रावजी खेत हार गए और यह किले पर शाही सेना आ रही है। ऐसा विचार कर रानीजी ने अन्यान्य सब परिवार की वीर महि- लाओं सहित प्रज्वलित अग्नि में शरीर होम कर शाका किया। जब राव जी ने किले में आकर यह दृश्य देखा तो सब सरदारों और सैनिकों को आज्ञा दी कि वे चित्तौर में जाकर कुँअर रतनसेन की रक्षा करें और आप शिव के मंदिर में जाकर नाना प्रकार के पूजन अर्चन करके यह वरदान माँगा कि अब जो मैं पुनः जन्म धारण करूँ तो इसी प्रकार वीर क्षत्रिय कुल में। और खड्ग खींचकर अपने ही हाथों से कमल के पुष्प के समान अपना माथा उतार शिव जी को चढ़ा दिया। जब यह समाचार अलाउद्दीन के कर्णगोचर हुआं तो राव जी के कर्त्तव्य पर पश्चात्ताप करता हुआ वह फौरन फिर आया और राव जी के संमुख खड़ा होकर अदब से प्रणाम करता हुआ बोला कि अब मुझे क्या आज्ञा है। यह सुनकर राव जी के मस्तक ने उत्तर दिया कि तुम जाकर समुद्र में शरीर छोड़ो तब हम तुम मिलेंगे। राव जी के शीश के वचन मानकर अलाउद्दीन ने वजीर महरम खाँ को आज्ञा दी कि वह सब लश्कर सहित दिल्ली जाकर "शाहजादा" अलावृत्त को तख्त पर बिठावे और वह आप उसी क्षण रामेश्वर को चला गया। वहाँ पर उसने रामेश्वर जी की पूजा की और उन्हीं का ३