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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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( ३६ ) का नाम हीरादेवी था जो बहुत रूपवती और सर्वथा अपने उच्च पद के योग्य थी। कुछ काल में हीरादेवी गर्भवती हुई। उसकी इस अवस्था की वासनाओं से गर्भस्थित जीव की प्रवृत्ति और उसके महत्त्व का आभास मिलता था। कभी कभी उन्हें मुसलमानों के रक्त से स्नान करने की इच्छा होती। उसके पति उसकी अभिलाषाओं को पूरा करते; अंत में, शुभ घड़ी में, उसको एक पुत्र उत्पन्न हुआ। पृथिवी की चारों दिशाओं ने सुंदर शोभा धारण की; सुखद समीर बहने लगा; आकाश निर्मल हो गया; सूर्य्य मृदुलता से चमकने लगा; राजा ने अपना आनंद ब्राह्मणों पर सुवर्ण बरसाकर और देवताओं की वंदना करके प्रगट किया। ज्योतिषियों ने बालक के मुहूर्त्तस्थान में पड़े हुए नक्षत्रों के शुभ योग का विचार करके भवि- ष्यद्वाणी की कि कुमार समस्त पृथिवी को अपने देश के शत्रु मुस- लमानों के रक्त से आर्द्र करेगा। बालक का नाम हम्मीर रखा गया। हम्मीर बढ़कर एक सुंदर और बलिष्ठ बालक हुआ उसने सब कलाओं को सीख लिया और शीघ्र ही वह युद्ध-विद्या में भी निपुण हो गया!, जैत्रसिंह के सुरत्राण और विराम दो और पुत्र थे, जो बड़े योद्धा थे। यह देखकर कि उनके पुत्र अब उनको राज्य के भार से मुक्त करने योग्य हो गए, जैत्रसिंह ने एक दिन हम्मीर से इस विषय में बातचीत की, और उन्हें किस रीति से चलना चाहिए इस विषय में उत्तम उपदेश देने के उपरांत, राज्य उनके (हम्मीर के) हवाले कर दिया, और वे आप वनवास करने चले गए। यह बात संवत् १३३९ (१२८३ ई०) में हुई।१ । छः गुणों और तीन शक्तियों से संपन्न होकर हम्मीर ने युद्ध के

१-ततश्च सवन्नववह्नि वह्निभूहायने माघवलक्षपक्षे । पौष्यां तिथौ हेलिदिने सपुष्ये दैवज्ञनिर्दिष्टबलेऽलिलग्ने ॥ सर्ग ८ श्लोक ५६