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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 258 में से

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पृष्ठ 59

प्रार्थना स्वीकार की और दोनों मोगलों ने तुरंत जगरा की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने नगर को घेरकर ले लिया और पीतम को कई और मनुष्यों के साथ बंदी बनाकर वे उसे फिर रणथंभौर ले आए। उलुगखाँ पराजय के पीछे तुरंत दिल्ली लौट गया और जो कुछ हुआ था अपने भाई से उसने सब कह सुनाया। उसके भाई ने उस पर कायरता का दोष लगाया; अपने भागने का दोष उसने यह कहकर मिटाया कि उस अवस्था में मेरे लिये केवल एक यही उपाय था जिससे इस संसार में एक बेर फिर मैं आपका दर्शन करता और चौहान से लड़ने के लिये दूसरा अवसर पाता। उलुगखाँ ने बात गढ़ कर छुट्टी भी न पाई थी कि क्रोध से लाल भोज भीतर आया। उसने अपने उपवस्त्र को पृथ्वी पर बिछा दिया और उसपर इस प्रकार लोटने और अंडबंड बकने लगा जैसे उस पर प्रेत चढ़ा हो। अला- उद्दीन को उसका यह विलक्षण आचरण कुछ कम बुरा नहीं लगा; उसने उसका कारण पूछा। भोज ने उत्तर दिया कि मेरे लिये इस विपत्ति को कभी भूलना कठिन है जो आज मुझपर पड़ी है; क्योंकि महिमासाह ने जगरा में जाकर मुझ पर आक्रमण किया और मेरे भाई पीतम को बंदी करके हम्मीर के पास ले गया। भोज ने कहा— लोग घृणा से मेरी ओर उँगली दिखाकर अब यही कहेंगे कि यह एक ऐसा मनुष्य है जिसने अधिक पाने के लालच से अपना सर्वस्व खो दिया। असहाय और अनाथ होकर मैं पृथ्वी पर अब भी बेखटके नहीं लेट सकता क्योंकि वह समस्त पृथ्वी हम्मीर की है; इसीलिये मैंने अपना वस्त्र बिछा दिया है जिसमें उसी पर मैं उस शोक में छटपटाऊँ जिसने मुझमें खड़े रहने की शक्ति भी नहीं रहने दी है। अपने भाई की सहायता की कथा से अलाउद्दीन के हृदय में क्रोध की अग्नि पहले ही से जल उठी थी अब भोज की ये बातें उस अग्नि में आहुति के समान हुईं। हृदय के आवेग में अपनी पगड़ी को पृथ्वी पर पटककर उसने कहा कि 'हम्मीर की मूर्खता उस मनुष्य

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