हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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और राल रखी गई कि यदि आक्रमणकारियों में से कोई निकट आने का साहस करे तो उसके शरीर पर वह छोड़ दी जाय, उपयुक्त स्थानों पर तोपें चढ़ा दी गईं। अंत में मुसलमानी सेना भी रण- थंभौर दुर्ग के सामने आई। कई दिन तक घमासान युद्ध होता रहा। नसरतखाँ अचानक एक गोली के लगने से मर गया और बरसात के आ जाने पर उलुगखाँ को लड़ाई बंद करनी पड़ी। वह दुर्ग से कुछ दूर हट गया और उसने अलाउद्दीन के पास अपनी भयानक स्थिति का समाचार भेजा। उसने नसरत खाँ का शव भी समाधिस्थ करने के निमित्त उसके पास भेज दिया। अलाउद्दीन ने यह समाचार पाकर तुरंत रणथंभौर की ओर प्रस्थान किया। यहाँ पहुँचकर उसने तुरंत अपनी सेना को दुर्ग के द्वार की ओर बढ़ाया और उसे छेंक लिया। हम्मीर ने इन कार्यों की तुच्छता सूचित करने के लिये दुर्ग की दीवारों पर कई जगह सूप के झंडे गड़वा दिए। इससे यह अभिप्राय झलकता था कि दुर्ग के संमुख अलाउद्दीन के आगमन से राजपूतों को कुछ भी बोझ वा कष्ट नहीं मालूम होता था। मुसलमान सरदार ने देखा कि उससे साधारण धैर्य और साहस के मनुष्यों से पाला नहीं पड़ा है, और उसने हम्मीर के पास सँदेसा भेजकर यह कहलाया कि मैं तुम्हारी वीरता से बहुत प्रसन्न हूँ, और ऐसा पराक्रमी शत्रु चाहे जिस बात की प्रार्थना करे उसे मानने में मैं प्रसन्न हूँ। हम्मीर ने उत्तर दिया कि यदि अलाउद्दीन जो मैं चाहूँ उसे देने में प्रसन्न है तो मेरे लिये इससे बढ़कर संतोष-की बात और कोई नहीं होगी कि वह दो दिन मेरे साथ युद्ध करे, और मुझे आशा है कि मेरी यह प्रार्थना स्वीकृत होगी। मुसलमान सरदार ने इस उत्तर की यह कहकर बड़ी प्रशंसा की कि वह सर्वथा उसके प्रतिद्वंद्वी के साहस के योग्य है और उससे दूसरे दिन युद्ध रोपने का वचन दिया। इसके अनंतर अत्यंत भीषण और कराल युद्ध हुआ। इन दो दिनों में मुसलमानों के कम से कम ८५००० आदमी मारे गए। दोनों योद्धाओं के बीच कुछ दिन विश्राम
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