हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४ ) हूँ और आपका राज्य और प्राण चिंतामणि वा पारस पत्थर के समान है; मैं बिनती करती हूँ कि आप उनको रखने के लिये मुझको ‘फेंक दीजिए।” जब वह भोली भाली लड़की इस प्रकार हाथ जोड़कर बोली तब राजा का जी भर आया। उन्होंने उससे कहा, “तुम अभी बालिका हो इससे जो कुछ तुम्हें सिखाया गया है उसके कहने में तुम्हारा कोई दोष नहीं। किंतु मैं नहीं कह सकता कि उनको क्या दंड मिलना चाहिए जिन्होंने तुम्हारे हृदय में ऐसे ख्याल भर दिए हैं। स्त्रियों का अंग भंग करना राजपूतों का काम नहीं, नहीं तो उनकी जीभ काट ली जाती जिन्होंने ऐसी कुत्सित बात मेरी कन्या के कान में कही।” हम्मीर ने फिर कहा “पुत्री ! तुम अभी इन बातों को समझने के लिये बहुत छोटी हो इससे तुम्हें बतलाना व्यर्थ है। किंतु तुम्हें म्लेच्छ मुसलमान को देकर सुख भोगना मेरे लिये ऐसा ही है जैसा अपना ही मांस खाकर जीवन काटना। ऐसे संबंध से मेरे कुल में कलंक लगेगा, मुक्ति की आशा नष्ट होगी, इस संसार में हमारे अंतिम दिन कडुए हो जायेंगे। मैं ऐसे कलंकित जीवन की अपेक्षा दस हजार वार मरना अच्छा समझता हूँ।” अब वे चुप हुए और दृढ़ता तथा स्नेह- पूर्वक अपनी कन्या को चले जाने को उन्होंने कहा। राजा, रतिपाल की संमति के अनुसार संध्या के समय अपनी शंकाओं को मिटाने के लिये रणमल के डेरे पर जाने को तैयार हुए, साथ में उन्होंने बहुत थोड़े आदमी लिए। जब वे रणमल के डेरे के निकट पहुँचे तब उसको (रणमल को) रतिपाल की बात याद आई। वह यह समझकर कि यदि मैं यहाँ ठहरूँगा तो मेरा बंदी होना निश्चय है, अपने दल के सहित गढ़ से भाग निकला और अलाउद्दीन की ओर जा मिला; यह देखकर रतिपाल ने भी वैसा ही किया। राजा इस प्रकार ठगे और घबड़ाए हुए कोट में लौट आए। उन्होंने भंडारी को बुलाकर भंडार की दशा पूछी कि कितने दिन तक सामान चल सकता है। भंडारी ने सच्ची बात कहने में अपने प्रभाव की