हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
पृष्ठ 74, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६० )
है वह देश जहाँ ऐसे ऐसे वीर हो गए हैं। धन्य हैं वे स्त्रियाँ जो अपने सतीत्व की रक्षा के लिये बिना कुछ सोचे विचारे इस क्षणभंगुर 'शरीर को नष्ट कर डालती थीं और धन्य हैं वे लोग जो उनके वृत्तांतों को पढ़कर आनंदित और प्रफुल्लित होते हों और जिन्हें अपने देश के गौरव की रक्षा का उत्साह होता हो । मैं पहले लिख चुका हूँ कि दो हम्मीर हो गए हैं। एक के विषय में तो मैंने इतना कुछ मसाला इकट्ठा कर दिया है। मेवाड़ के हम्मीर के विषय में भी कुछ कह देना आवश्यक जानकर ठाकुर हनुवंत सिंह लिखित मेवाड़ के इतिहास से इनका वृत्तांत उद्धृत कर देता हूँ। वह इस प्रकार है— “लखमसी जी के पीछे मुसलमानों से बैर लेनेवाला अब केवल उनका लड़का अजयसिंह था जो कि केलवाड़े में रहता था। यह केलवाड़ा अर्वली पर्वत के उच्च प्रदेश में है। वहाँ उसकी रक्षा करने- वाले भील लोग थे। अजयसिंह जी के बड़े भाई अरसी जी के कुँवर हम्मीरसिंह को अपने पीछे गद्दी पर बिठलाने का वचन लखमसी जी ने अजयसिंह से ले लिया था। इससे तथा अजयसिंह के पुत्र के हम्मीरसिंह के समान पराक्रमी न होने से उनके उत्तराधिकारी हम्मीर- सिंह ही थे। इनकी माता के विषय में यह कथा प्रसिद्ध है कि एक दिन अरसी जी युवराजत्व अवस्था में ऊदबा गाँव के जंगल में आखेट को गए थे। वहाँ जब एक सूअर के पीछे इन्होंने घोड़ा दिया तो वह भागकर ज्वार के खेत में घुस गया। ज्योंही अरसी जी सूअर के पीछे खेत में जाने लगे त्योंही एक कन्या ने, जो उस खेत की चौकसी कर रही थी, इनको भीतर जाने से रोका और कहा कि ठहरो सूअर को मैं बाहर निकाले देती हूँ। फिर उस लड़की ने ज्वार के पेड़ को उखाड़ सूअर को दो चार सपाटा लगाकर उसे उनकी ओर खदेड़ दिया। उस लड़की की निर्भयता को देख आखेटकों को बड़ा आश्चर्य हुआ। पीछे जब कि वे एक नाले पर विश्राम करने के लिये ठहरे हुए थे तो सनसनाता हुआ दूर से एक पत्थर का टुकड़ा आया और