हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६३ ) थोड़े दिनों में हीं हम्मीरसिंह ने अपना गौरव आस पास के राजाओं पर जमा लिया। अब चित्तौर को किस विधि लूँ इस विचार में हम्मीरसिंह पड़े। “हम्मीरसिंह ने चित्तौर के आस-पास का सारा देश लूटकर उजाड़ डाला, अकेला चित्तौर ही मुसलमानों के अधीन रह गया था। किसी प्रकार उसे लूँ, यही हम्मीरसिंह का दृढ़ विचार था। एक दिन उन्होंने अपने सब मनुष्यों को बुलाकर कहा कि "भाइयो ! जिसे जीने की इच्छा हो, जिसे संसार के इन क्षणिक सुखों के बदले स्वर्ग का सुख छोड़ देना हो, जिसे अपनी प्रतिष्ठा की अपेक्षा प्राण प्यारे हों, जिसे अपने उग्र वैरी मुसलमानों का डर हो, जिसे अपनी गई हुई भूमाता को तुर्कों के हाथ में से निकाल लेने की हौस न हो और जिसको इस अर्वली पर्वत की झाड़ो जंगलों में सदा पड़े रहने की इच्छा हो, वह भले ही सुख से इस अर्वली की विकट गुह्य गुफाओं में रहे, यह मेरी आज्ञा हं । जो मेरी भुजा मे बल होगा तो तुम्हारे चले जाने पर भी अपने कुलदेवता की सहायता स अकेला भी चित्तौर को लूँगा । तुम लांग सुख से जाओ और जो ईश्वर-इच्छा से मैं चित्तोर को जल्दी ले सका तो तुमको पाछे बुला लूँगा, उस समय आ जाना ।” हम्मीरसिंह के मनुष्यों में राजपूत भी थे परंतु अधिक तो आसपास के भील लोग थे । उन लोगों ने बालकपन से ही हम्मीरसिंह का पराक्रम देख रखा था और निरंतर उनके साथ रहने से वे भी राजपूतों के समान ही साहसी और पराक्रमी हो गए थे और हम्मीरसिंह के चाल-चलन तथा व्यवहार से ही वे लोग ऐसे प्रसन्न थे कि यदि वे कहते तो प्राण देने को वे लोग उद्यत हो जाते । हम्मीरसिंह के उपरोक्त वचनों का उत्तर उन लोगों ने इस प्रकार दिया—"हम मरेंगे अथवा शत्रुओं को मारेंगे परंतु अपने राजा को छोड़कर कभी पीछे न हटेंगे, हम अपने कुल को कलंकित न करेंगे, हम अपने शत्रुओं के हाथ में से अपनी भूमाता को छुड़ाने के लिये अपने प्राण देंगे और इस जगत् के क्षणस्थायी सुखों को छोड़ स्वर्ग