भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

( ७६ ) हारीतसंहिता। [ प्रथमस्थाने- इन रोगोंको और मार्गके चलनेसे थकना,परिश्रम, मद, विष, मूत्रकृच्छ्र, पथरी इन रोगोंको और बुढ़ापा, विषमज्वर, रक्तपित्तका प्रकोप, तृषा, दाह, क्षय, रक्तरोग इनको गुड़ हरता है ॥१८॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने इक्षुवर्गो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ एकादशोऽध्यायः ११. अथ कांजीके वर्ग । सन्धानं शीतलं स्वादु महातीसारनाशनम् ॥ कांजी शीतल है, स्वादु है, महातीसारको नाशती है । अथ चावलोंके पानीका गुण । सुस्वादु शीतलं चैव बृंहणं तण्डुलोदकम् ॥ १ ॥ चावलोंका पानी सुंदर स्वादु है, शीतल है और धातुओंको पुष्ट करता है ॥ १ ॥ अथ तुषोदकका गुण । सवातपित्तस्य हरं तुषोदं सरक्तपित्तस्य प्रभेदकञ्च ॥ विपाचनं स्याज्जरणं कृमिघ्नमजीर्णनाशं कटुक विपाके॥२॥ तुषोदक वातपित्तको हरता है, रक्तपित्तको हरता है, भेदन करता है, विशेषकरके पाचन है, जराता है, कीड़ोंको हरता है, अजीर्णको हरता है और पाककालमें चर्चरा है ॥ २ ॥ अथ जब और गेहूंकी कांजीका गुण । जातं यवाम्लं कटुकं विपाकेवातापहं श्लेष्महरं सरक्तम्॥पित्ता- प्रकोपं कुरुते सभेदि विदूषणं पित्तगदास्रजश्व ॥३॥ संदीपनं शूलहरं सुरुच्यं गोधूमजातं क्वथितं कषायम्॥सन्दीपनं स्या- ज्जरणं कफघ्नं समीरदोषं हरते ततोऽपि ॥ ४ ॥ जबोंकी कांजी पाककालमें चर्चरी है, वातको और कफको हरती है, रक्तको और पित्तको कोपती है,भेदन करती है और पित्त और रक्तको दूषित करती है ॥ ३ ॥ गेहूंकी कांजी दीपन है, शूल हरती है, रुचिकर है, कषैली है, जठराग्निको तेजकरती है, कफघ्न है और वातदोषको हरती है ॥ ४ ॥ अथ तेलयुक्त कांजीका गुण । पीतं जरयते चामं बाह्यादाहश्रमापहम् ॥ स्याच्च तत्कुष्ठकण्डूघ्नं तैलयुक्तं समीरहृत् ॥ ५ ॥