हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३० ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- कन्या, दही, मछली, बालक इनको देखता है अथवा फूल और बेलसे फलित हुए वृक्ष- को देखे ये स्वप्न स्वस्थ मनुष्यकों आवे तो धनकी प्राप्ति होगी और रोगीमनुष्यके रोगका नाश होवे ॥ ११ ॥ स्वप्नमें दूधका पीना अतिश्रेष्ठ है, मदिराका पीना अथवा बकराके मांसका भोजन, घृत, गुंडयाणी, खीचड़ी, चावल, दूधका भोजन इनको स्वप्नमें देखे तो सुखकी प्राप्ति होवे ॥ १२ ॥ मनुष्यके दाहिने हाथके अग्रभागको अथवा शरीरको सफेद सर्प सोते- हुए डसता है ऐसे स्वप्नसे पुत्रका और धनका लाभ होता है अथवा शीघ्र ही रोगका नाश होता है ॥ १३ ॥ सफेद वस्त्रोंवाली और रमणीक और सुन्दर ऐसी स्त्रीसे जो मनुष्य मिलाप करता है उसको अत्यंत स्त्रीसुख और धनकी प्राप्ति होती है और पुत्रका लाभ और रोगोंका नाश होता है ॥ १४ ॥ जो मनुष्य तिल, चावल, गेहूं, सरसों, जव, अन्न- का समूह स्वप्नमें देखता है, उसको अन्नकी प्राप्ति और रोगका नाश होता है और सुख भी मिलता है ॥ १५ ॥ जो मनुष्य स्वप्नमें फल सहित वृक्षको देखे, तो उसको धनसंपत्ति प्राप्त होती है और जलता हुआ देखे तो रोगका नाश होता है, पुष्पकारिके युक्त वृक्षको देखे तो सुख होता है और पत्र, पुष्प, फल और शाखा आदिकोंकारके युक्त वृक्षको देखे तो मनवांछित फल मिलता है ॥ १६ ॥ अथ अशुभ स्वप्नोंका वर्णन । काकैः कंकैः करभभुजगैः सूकरोलूकगृध्रैर्जम्बूकेर्वा वृकखरमहि- ष्यातिऋक्षैः श्वभिश्च ॥ व्याघ्रैर्ग्राहैर्मकरकपिभिर्भक्ष्यमाणं स्व- कायं पश्येद्योऽसौ भजति नितरां हानिमापद्रुजं वा ॥ १७ ॥ योऽभ्यञ्जितं स्वं मनुजः प्रपश्येत्सर्षिपैस्तैलविशेषणेन ॥ शीघ्रं रुजार्तिर्भवतीह तस्य वदन्ति धीरा निपुणं विधेयम् ॥ १८ ॥ व्याघ्रोष्ट्रखरसंयुक्ते रथे सौरभसंयुते ॥ उह्यमानो दिशं याम्यां गच्छेद्व स मृतिं भजेत् ॥१९॥ रक्तवस्त्रां कृष्णवस्त्रां मुक्तकेशां विसर्पिणीम् ॥ याम्यां स्थितां रुदन्तीं वा गायन्तीमथ पश्यति ॥ २० ॥ अथाह्वयति संक्रुद्धां समालिङ्गति चर्वति॥ यः पश्य- ति सुखी स स्याद्व्याधितो मृत्युमृच्छति ॥२१॥ यस्य स्वप्ने च निष्कुष्टदन्तपातः प्रदृश्यते ॥शीय्यन्ते केशरोमाणि स सुखी चापदं व्रजेत् ॥२२॥ यस्य खड्गा प्रभज्येत तोमरादिप्रहारतः॥ रक्तं च दृश्यते देहे स स्वस्थो व्याधिमृच्छति ॥२३॥ शून्यागारं