हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 251, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( २१९) अथ शालिपर्ण्यादिपान । शालिपर्णीपृश्निपर्णीबलाबिल्वैस्तु साधितः ॥ दाडिमाम्लो हितः पेयः पित्तातीसारशान्तये॥ ४४ ॥ शालवन, पिठवन, खरेंहटी, बेलगिरी, इनसे बनायी अनारकी कांजीको पीना यह पित्तातीसारकी शांतिमें हित है ॥ ४४ ॥ अथ तृणमूलका क्वाथ । कुशकाशेक्षुमूलानां शालीनलभवेर्जलैः ॥ मूलानां क्वाथमाहृत्य शस्तं पित्तातिसारिणाम् ॥४५॥ कुश, काश, ईख, इनकी जडोंका चावल और कमलके पानीमें क्वाथ बना पीवे यह पित्तातीसारियोंको श्रेष्ठ है ॥ ४५ ॥ अथ धान्यपञ्चकादिक्वाथ । धान्यपञ्चकमूलानां क्वाथः पित्तातिसारिणाम् ॥४६॥ धनियाँ और पंचमूलका क्वाथ पित्तातिसारियोंको हित है ॥ ४६ ॥ अथ शाल्मलीमूलकल्क । शाल्मलीमूलत्वग्गुडदुग्धपेषितं च ॥ पानं पित्तातिशमनं सरक्तदाहशोषहरम् ॥ ४७ ॥ सभलकी जड और छाल, गुड़ इनको दूधमें पीस पीवे । यह पित्तातिसार, रक्त, दाह, शोष इनको हरता है ॥ ४७ ॥ अथ कफातिसारलक्षण । दुःस्वप्नादिश्रमाद्वै सहजजडतया शीतसंसेवनेन स्निग्धाहाराति- भोज्यात्सतिलपलगुडैश्चेक्षुखण्डैर्गुरूणाम् ॥ शीतातिस्नानलौ- ल्यात्पयसि दधियुताहारसंसेवनाच्च जातः श्लेष्मातिसारो जठर- हुतभुजं हंति पुंसामपाकः ॥ ४८॥ तेन श्लेष्मा शुष्कभेदारुचिः स्यात्सान्द्रं विस्रं जाड्यता रोमहर्षः ॥ मन्दाग्नित्वं मन्दवेगो विशिष्टः सालस्योऽपि विद्धि सारः कफोत्थः ॥ ४९ ॥ दुःस्वप्न अर्थात् बुरीतरह शयन आदिसे, परिश्रमसे,स्वाभाविक जड़पनेसे, शीतलपदार्थके सेवनेसे चिकने भोजनको और अत्यन्तभोजनके करनेसे और तिल, गुड़, मांस, ईखका गांड़ा, भारीपदार्थ इनके सेवनेसे और शीतलपानीमें अत्यंत स्नान और चंचलता करनेसे और Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu