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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

( २३८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ धान्यांकुरकृमिका लक्षण । ये च धान्याङ्कुरास्तेषां वक्ष्याम्यथ च लक्षणम्॥मलाशयस्थाः क्रिमयो मलं जग्धन्ति ते भृशम् ॥१६॥ तैस्तु संजायते देहे विद्रधिर्भेद्वनं तथा ॥ पारुष्यं कार्श्यमङ्गानां रुजत्वं हृत्क्कु- मोद्भवः ॥ १७॥ धान्यके अंकुरके समान कृमिके लक्षणको कहता हूँ। मलाशयमें स्थित हुए ये कृमि मलको खाते हैं ॥१६॥उनसे देहमें कृशपना, विद्रधि,हड़फोड़,कठोरपना, शूल ये उपजते हैं ॥ १७॥ हारीतका प्रश्न । हारीतः संशयापन्नः पादौ संगृह्य पृच्छति॥कथं देहे मनुष्यस्य मलमूत्ररसाशये ॥१८॥ संभवन्ति कथं चादौ वर्द्धयन्ति कथं पुनः॥ कथं च शीर्णेऽन्नरसे नानाहारविभक्षणे ॥१९॥ जायन्ते केन क्रिमयःसूक्ष्मा वाप्यधोगामिनः॥नानामपक्वं भक्ष्यान्नं दहते वा हुताशनः ॥ २० ॥ कथं ते क्रिमयश्चान्ते न दह्यन्तैऽन्तरा- ग्निना ॥ एवं पृष्टो महाचार्य्यः प्रोवाच मुनिपुङ्गवः ॥ २१ ॥ संशयको प्राप्त हुआ हारीतमुनि आत्रेयजीके पैरोंको ग्रहण कर पूछता है,हे भगवन् ! मनुष्यके मल मूत्र और रस आशयमें किस भांति पहिले कृमि उपजते हैं और फिर कैसे बढ़जाते हैं तथा अनेक विधिके आहारोंके खाने और अन्नके रसके पकनेपर सूक्ष्म और अधोगामी कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं ? अनेक अन्नोंको अग्नि जला देता है ॥ १८ ॥ १९ ॥ २० ॥ परंतु वे कृमि समीपमें स्थित हुए भी उसी अग्निसे क्यों नहीं दग्ध होते ? ऐसे पूछे हुए महा आचार्य्य और मुनियोंमें श्रेष्ठ आत्रेयजी कहने लगे ॥ २१ ॥ अथ आत्रेयजीका उत्तर । आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र महाबाहो क्रिमिसम्भवकारणम् ॥ विरुद्धात्नरसैः पुत्र रक्तं चैवास्य कुप्यति ॥ २२॥ कफेनैक- दिनं याति शुक्रेण कारणं व्रजेत्॥पञ्चभूतात्मके काये ते तु जाताः सचेतनाः ॥२३॥ कोष्ठाग्निना न दह्यन्ते न जीर्य्यन्ते रसैस्तथा॥ विषे जातो यथा कीटो न विषेण मृतिं व्रजेत् ॥ २४ ॥ तथा हुताशनोद्भूतं न हुताशेन जीर्य्यते॥ २५ ॥भेषजं संप्रवक्ष्यामि

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