भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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अ० १०] भाषाटीकासमेता । (२८७) अथ तालीसचूर्ण । तालीसचूर्णमिह पित्तकफस्य कासे पेयं न किं वृषभपत्ररसेन युक्तम् ॥ हन्ति भ्रमं श्वसनकासनमाशु यो वै भग्नस्वरे त्वरित- मेव सुखं ददाति ॥ २७॥ पित्त और कफके कासमें अडूसाके पत्तेके रससे युक्त तालीस चूर्ण क्या न पीना चाहिये जो भ्रम, श्वास और कासको शीघ्र हटाता है और भग्नस्वरमें शीघ्र ही सुख देता है ॥ २७ ॥ अथ अडूसाका क्वाथ और कल्क । आटरूषकमृद्वीकापथ्याक्वाथः सशर्करः॥क्षौद्रान्व्यः कसनश्वास- रक्तपित्तनिवारणः ॥२८॥ छागं पयो वा सुरभीपयो वा चतुर्गुणश्चापि जलेन कल्कः ॥ सशर्करं पानमिदं प्रशस्तं सर- क्तपित्तं विनिहन्ति चाशु ॥ २९ ॥ वांसा, मुनका, दाख इनके क्वाथमें खांड मिला और शहद मिला देनेसे श्वास, खांसी, रक्तपित्त इनका निवारण होता है ॥ २८ ॥ बकरीका दूध अथवा गौका दूध और चौगुना जल इनमें वांसाका कल्क मिला सिद्ध कर फिर खांड़के संग इसका पीना श्रेष्ठ है यह रक्तपित्तको नाशता है ॥ २९ ॥ बलाश्र्वदंष्ट्रामलकीफलानि द्राक्षा मधूकं मधुयष्टिकानाम् ॥ सिद्धं पयःपानमिदं हितं स्यात्पित्ते सरक्ते मनुजस्य शान्त्यै ॥ ॥३०॥ खदिरस्य प्रियंगूनां कोविदारस्य शाल्मलेः ॥ पुष्प- चूर्णं तु मधुना लिह्यादारोग्यमस्तुते ॥ ३१ ॥ आटरूषकरसेन सप्तधा भाविता च पुनरेव शोषिता ॥ पिप्पलीमधुसमन्विता- मया रक्तपित्तमतिदुर्जयं जयेत्॥३२॥एलाफलानि च सपद्मक- नागकेशरं द्राक्षा घना मधुकपिप्पलिक समांशा ॥ एषां समां- शसितशर्करयुक्तलेहः खर्जूरिका समभिहन्ति च रक्तपित्तम् ॥ ॥ ३३ ॥ दाहं ज्वरार्त्तिश्वसनं च विमोहंतृष्णां मूर्च्छां निहन्ति रुधिरं वमिजित्तथैव ॥ ३४ ॥ खैंहटी, गोखरू, आंवला, दाख, महुआवृक्षकी छाल, मुलहटी, इनके दूधमें मिला Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu