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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 548 में से

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पृष्ठ 321

अ० १० ] भाषाटीकासमेता । ( २८९ ) अथ पलाण्डादि नस्य । पलाण्डुपत्रनिर्यासनस्यं नासाग्रजावहम् ॥ यष्टीमधुमधुयुतं पश्चान्नस्येऽस्रजं जयेत् ॥ ३९ ॥ प्याजके पत्तोंकी नस्य देनेसे रक्तपित्तरोग दूर होता है और मुलहटी, शहद इनकी नस्य देने- से शीघ्र ही इस रोगका नाश होता है ॥ ३९ ॥ अथ वासादिपानक । वासापत्ररसं विधाय मतिमान्योज्यानि चेमानि तु रोध्रं चोत्पल- मृत्तिकासमधुकं कुष्ठं प्रियङ्ग्वन्वितम्॥ चूर्णं पुष्परसेन पाचक- मिदं पित्ताश्रयाणां हितं कासकामलपाण्डुरोगक्षतजश्वासाप- मर्दि भवेत् ॥ ४० ॥ वांसाके पत्तोंके रसको निचोड़ उसमें लोध, कमलकी जड़की मृत्तिका, मुलहटी, गोंदी इनका चूर्ण मिला और वांसाके पत्तोंका रस मिला फिर इसको खावे यह पाचक है और पित्ताशयवालोंको हित है और खांसी, कामला, पांडुरोग, चोटसे उपजा हुआ श्वासस्रोग इनको नाशता है ॥४०॥ अथ दाडिमादि रस । रसो हितो दाडिमपुष्पकस्य तथैव किञ्जल्करसोत्पलस्य ॥ लाक्षारसो वा पयसा च नस्याद् घ्राणप्रवृत्तं रुधिरं रुणद्धि॥४१ अनारकी कलीका रस तथा कमलकी केशर और लाखका रस इनका दूधके संग नस्य देनेसे नासिकामें प्रवृत्त हुआ रुधिर रुक जाता है ॥ ४१ ॥ अथ मुखमें प्रवृत्त हुए रुधिरकी चिकित्सा । दाडिमपुष्पादि नस्य । यदि वदनपथेऽसृक् जायते तस्य कुर्यात्प्रतिविधिमहमेनां वच्मि संञ्चित्य युक्ताम् ॥ भवति न सुखसाध्यं लोहितं मानु- षेषु तदनु युवतियोन्यां रक्तवाहस्त्वसाध्यः ॥४२॥ मधु मधु- कमुशीरं कञ्जकिञ्जल्कदूर्वारसमिह परिपीतं दाडिमस्य प्रसूतम्॥ मलयजसितकुष्ठं पद्मकं चैव बालं मधु मधुकमुशीरं कोद्रवौ द्वौ समन्तात् ॥४३॥ समसुरभिपयो वा धावनं तण्डुलानां परिक- लितसमग्रं तुर्य्यभागेन योज्यम् ॥ लघुतरमपि वह्नौ धावितं १९

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