भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

( ३२२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- संयुक्तां छर्दिं दूरे परित्यजेत् ॥ असाध्या सर्वयोगैस्तु साप्यजीर्णा सुधीमता ॥ ४९ ॥ अजीर्णसे, वमन होनेसे खल्लीरोग हो जावे, मूर्च्छा हो जावे और वमन भी स्निग्ध, रूक्ष ऐसे दो प्रकारकी होती हैं ॥४६॥ जिसके गंभीर नेत्र हों और वमन करे, विष्ठा बन्ध हो, अतिसार हो और शरीरमें खल्ली रोग हो, शूल हो, शोजा हो, अतिमूर्च्छा हो ॥४७॥ अंग विकल हो, भ्रमकी पीडा हो, जगतको भ्रमताहुआ देखे, शिरमें पीडा हो, कांपन हो, हाथ पैर ठंढे हों ॥४८॥ इन लक्ष- णोंसे युक्त जो वमन हो उसको दूरसे ही त्याग देवे और सब योगों करके यह असाध्य है अजी- र्णसे उपजी कहाती है ॥ ४९ ॥ अथ वातच्छर्द्दिकी चिकित्सा । सपञ्चमूलीकथितः कषायः ससैन्धवं चामलकञ्च कल्कः ॥ क्वाथं पिबेन्मिश्रितपिप्पलीकं छद्देश्च वातस्य निवारकञ्च॥५०॥ दद्यात्क्षीरं शर्कराभिर्नरस्य पित्तोद्भूतां वातिशीघ्रं निहन्ति ॥ द्राक्षा वापि क्षीरदाव्यर्या विचूर्णं लेहो हन्ति सारघाणां पिबन्ति॥ ॥५१॥ फलत्रिकं पुष्करकं वचां च तथाभयासैन्धवकं गुडेन ॥ चूर्णं विलिह्यात्कफवान्तिमत्ति नरस्य मूत्रेण युतस्य पानम् ॥ ॥ ५२ ॥ शटी दार्व्यभया शुण्ठी मागधी घृतसंयुता ॥ चूर्णं तक्रेण संयुक्तं हन्ति छर्दिं त्रिदोषजाम् ॥५३॥ रक्तशाल्युद्भवा लाजा मधुशर्करयान्विता ॥ ज्वरात्तिं युवतेः शीघ्रं नाशयंत्येव मे मतम् ॥५४॥ आमलक्या रसेनाथ घृष्टं चन्दनकं मधु ॥ गुटिका पलमानेन लेहो हन्ति वमिं ध्रुवम् ॥५५॥ आर्द्रदाडि- मनिर्यासाश्चाजाजी शर्करान्विता ॥ सतैलं माक्षिकं वापि चत्वारः कवलग्रहाः ॥ ५६ ॥ वाताद्यद्वन्द्वजांश्छर्दीन्निहन्त्येव न संशयः ॥ ५७ ॥ त्रिकटुकरजनीद्वयं च फलत्रिकं मध्वा च यावशूकञ्च ॥ समकृतमिति चूर्णमेतन्मधुना युतं वमिं निवार- यति ॥ ५८ ॥ सगुडं दाडिमद्राक्षापथ्यागुडनागरैर्युक्ता ॥ त्रिवृता नागरमथवा गुडेन युक्तं वमिं दहति ॥ ५९ ॥