हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १३] भाषाटीकासमेता। (३२९) कालदाडिमवृक्षाम्लाः सारिवा समशर्करा ॥ पथ्या दाडिमचूर्णं वा मातुलुङ्गरसान्वितम् ॥ २५ ॥ जवासा, पित्तपापडा, कांगनी, लोध, सूंठ, मिर्च, पीपल, कूट इनके काथको शीतल बन उसमें शहद और खांड़ मिला पीवे यह त्रिदोषकी तृषाको नष्ट करता है। कालाअनार, वृक्षाम्ल और सारिवा इनके समान भाग शर्कराका चूर्ण खावे अथवा सूंठ और अनारका चूर्ण बिजौराके रसके साथ खावे ॥ २५ ॥ अथ तालुशोषकी चिकित्सा। काष्ठपात्रे शृतं सम्यक्शीतलं सलिलं तथा ॥ मर्दितं बहुवेलां तु तत्पानीयंच पाययेत् ॥ २६ ॥ तालुशोषे घृतं तच्च दापयेच्च भिषग्वरः॥तृष्णादाहभ्रमच्छर्दिशोषमूर्च्छा व्यपोहति ॥ २७ ॥ क्षतजां क्षयजां तृष्णां वारयत्याशु निश्चितम् ॥ २८ ॥ गरम किये पानीको काष्ठके पात्रमें घाल बहुत देरतक मर्दितकर पीवे ॥ २६ ॥ और उसी पानीमें घृतको सिद्धकर वैद्य तालुशोषमें देवे यह तृषा, दाह, भ्रम, छर्दि, शोष, मूर्च्छा इनको नाशता है ॥ २७ ॥ क्षतसे और क्षयसे उपजी तृषाको शीघ्र दूर करता है ॥ २८ ॥ अथ दाडिमकोल । दाडिमं कोल चुक्रीका वृक्षाम्लं चाम्लवेतसम् ॥ रसं चैव तथा पथ्यायुक्तं तालुप्रलेपनम् ॥ २९ ॥ अनार, बेर, चूका, बिजौरा, अम्लवेतसके रसमें हरडेका चूर्ण मिला तालूपर लेप करै ॥ २९ ॥ अथ तृष्णाआदिकोंकी साधारण चिकित्सा । वारयत्याशु शोषं च तृष्णां हन्ति च सज्वराम्॥केसरं मातुलु- ङ्गस्य पिष्टं तण्डुलवारिणा ॥३०॥ प्रतप्तमधुना तालुलेपो मुख- शोषापहः ॥ मधुशर्करया तालुलेपो शोषनिवारणः ॥ ३१ ॥ पद्मकन्दशृतालेपः शीतः शीतलवारिणा ॥ तालुशोषं निह- न्त्याशु जम्ब्वाम्रपल्लवानि च ॥ ३२ ॥ निम्बान् वा मातुलु- ङ्गान् वा सौवीरं नागराणि च ॥ तृषार्त्तपुरतो भक्ष्यन्न देयं तस्य धीमता॥३३॥ दर्शनात्तस्य चास्ये च लाला प्रस्रवते भृशम् ॥