भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 363

तन मद्येनाथ विषेण वा॥एतेषां कोपयेत्पित्तं मरुद्रक्तं समीरि- तम् ॥५॥ संख्यादौर्बल्यकं तेन मूर्च्छा मोहःप्रकथ्यते ॥ कथ- यामि समासेन लक्षणानि पृथक्पृथक् ॥ ६ ॥ आत्रेय कहते हैं-विषयआदि वेगके अभिघातसे,मूत्रआदिको रोकनेसे, क्षीण छतसे, तृषाकी पीडासे, विरुद्ध अन्नको सेवनेसे दुष्टहुआ वातआदि दोष मूर्च्छाको करता है ॥ १ ॥ अलग २ बारहनाड़ी पांचों इन्द्रियोंमें लगीहुई हैं एसे साठ नाड़ी जाननी ॥ २ ॥ जब दुष्ट हुए दोष नाड़ियोंके द्वारको रोकते हैं तब मनुष्य मूर्च्छाको प्राप्त होते हैं । संज्ञाके नाश होनेसे शीघ्रही जड़रूप मनुष्य होजाता है ॥ ३ ॥ और काष्ठकी तरह मनुष्य शीघ्र गिर पड़ता है उसको मोहमूर्च्छा कहते हैं वह छःप्रकारकी कही है ॥ ४ ॥ वातकी, पित्तकी, कफकी, रक्तकी, चोटकी, मदिराकी अथवा विषकी, ऐसे मूर्च्छा हैं। वायु और रक्तसे प्रेरित किया पित्त इन मूर्च्छाओंको कोपित करता है ॥ ५ ॥ ऐसे गिनती है अब इस मोहमूर्च्छाके लक्षणोंको विस्तारसे पृथक् २ कहता हूं ॥ ६ ॥ अथ मूर्च्छाका लक्षण । नीलं कृष्णारुणं पश्येत्तमः प्रविशति क्षणात् ॥ कम्पो मार्दवमेतासां क्षणेन प्रतिबुध्यति ॥ ७ ॥ नीला, काला,लाल ऐसे रंगको देखे और क्षणभरमें अंधेरीको प्राप्त होवे,कंप हो और शरीर शिथिल होजावे और क्षणभरमें जागे ये मूर्च्छाके लक्षण हैं ॥ ७ ॥ अथ वातजआदिमूर्च्छालक्षण । वातेन मूर्च्छा भवति कृशता विकृतास्यता ॥ नेत्रस्रावश्च मृष्टिश्च आध्मानञ्च भवेत्क्षणम् ॥ ८ ॥ शरीर कृश होवे, मुख विकारको प्राप्त हो, नेत्रोंमें पानी झिरे और शरीरमें हड़फूटन होवे और क्षणभरमें पेटपर अफारा हो तब वातकी मूर्च्छा जाननी ॥ ८ ॥ अथ पित्तजमूर्च्छा । पीतञ्च नीलहरितं तमः प्रविशते भृशम् ॥ सन्तापश्च पिपासा च रक्ते पीते च लोचने ॥९॥ सस्वेदं शरीरं चापि श्रमःसंभि- न्नवर्चसाम्॥पित्ताद्भवति मूर्च्छार्तत्वं जायते च शिरोव्यथा॥१०॥ पीला, नीला, हरा ऐसे अंधेरेमें प्राप्त हो, संताप और पिपासा हो, लाल और पीले नेत्र हो जावें ॥ ९ ॥ पसीना आवे, श्रम हो,पतला मल उतरे और शिरमें पीडा हो तब पित्तका मूर्च्छा जाननी ॥ १० ॥