हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १] भाषाटीकासमेता । (५) भिषजं प्रयाति ॥२५॥ यद्वत्तमोवृतमिदं भुवनं मयूखैः प्राका- श्यमाशु कुरुते सकलं रविस्तु ॥ तद्वत्सुवैद्य उपलभ्य रुजो- ऽतिनाशं शीघ्रं करोति गदिनं गदमुक्तभारम् ॥ २६ ॥ जैसे सिंहको देखके हस्तियोंके समूहके स्वामीकी मदबिंदुओंकी धारा गंडस्थलमें ही सूख जाती है और वह हाथी उस वनको त्याग व्याकुल मन करके भागता है तैसे वैद्यको देख कर रोगरूपी गजराज गमन करता है ॥ २५॥ जैसे अन्धकारसे आच्छादित इस समस्त संसार- को सूर्य अपनी किरणोंसे प्रकाशित कर देता है तैसे ही सुवैद्य रोगको नाशकर रोगीको रोगके भारसे छुड़ा देता है ॥ २६ ॥ लुब्धः क्रूरः१ शठजठरको मद्यपश्चालसश्चाधीरो भीरुर्विकलहृदयो हीनकर्मार्थमन्दः॥ शास्त्रज्ञाताऽप्यविदितगदज्ञानपाखण्डखण्डो वर्ज्यो वैद्यः प्रबलमतिभिर्भूमिपैर्वा सुदूरात् ॥ २७ ॥ लोभी, हिंसक, शठ, कठोर, मदिरा पीनेवाला, आलसी, अधीर, डरनेवाला, विकल हृदय, हीनकर्मवाला, कंगाल, वैद्यक न जाननेवाला, पाखंडी ऐसा वैद्य यदि अन्यशास्त्रोंके जाननेवाला भी हो तो भी उसको अच्छी बुद्धिवाले राजाओंको दूर रखना चाहिये ॥ २७ ॥ वैद्यशास्त्रपठनविधि । अद्रुतं चाप्यशङ्कञ्च नात्युच्चं नीचमेव च ॥ यः पठेच्छास्त्रमि- त्यञ्च शास्त्राप्तिस्तस्य दृश्यते ॥ २८ ॥ चर्वणं गिलनं चापि कम्पितं श्वसितं तथा॥नीचोच्चं चैव गम्भीरं वर्जयेत्पाठकेनतु२९ जो विचार विचार कर बे खौफ न अति उच्चस्वरमें न अति नीचस्वरमें पढ़ता है, उसे शास्त्रकी प्राप्ति होती है ॥ २८ ॥ चाबना, निगलना, काँपना, अतिश्वास लेना, नीचापना, ऊँचापना और गंभीरपना विद्यार्थीको छोड़ देना चाहिये ॥ २९ ॥ अनध्याये न शास्त्रस्य नोत्सवे यज्ञकर्मसु ॥ जातके सूतके चाथ पठनं न विधीयते ॥३०॥चतुर्दश्यष्टमीदर्शप्रतिपत्पूर्णिमास्तथा॥ वर्ज्याः पञ्च इमाः पाठे मुनिभिः परिकीर्तिताः ॥ ३१ ॥ अकाले दुर्दिने गर्जे दिग्दाहे भूमिकम्पने ॥ शास्त्रपाठस्तथा वर्ज्यो ग्रहणे १ 'नृशंसो धातुकः क्रूरः' इत्यमरः ।