हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३४९ ) मंद अग्नि हो जावे, अनेक सुपने आवे, निद्राका नाश हो जावे शरीरमें क्षोभ होवे ये सामान्य वातके लक्षण हैं ॥ १७ ॥ अथ आक्षेपकवायुका लक्षण तथा अपतन्त्रकवायुका लक्षण । मुहुराक्षेपयेद्गात्रं मेदस्तोदो बहुस्वरः ॥ स चैवाक्षेपको नाम जातो व्यानप्रकोपतः ॥ १८ ॥ धनुर्वन्नाम्यते गात्रमाक्षिपेच्च मुहुर्मुहुः ॥ प्रक्लिन्ननेत्रस्तब्धाक्षः कपोत इव कूजति ॥ तमाहु- र्भिषजां श्रेष्ठा अपतन्त्रकनामतः ॥ १९ ॥ और जो वारंवार शरीर कांपे, मेदमें व्यथा हो, ज्वर बहुत हो जावे ऐसा आक्षेपकनाम- वाला वायु होता है, यह व्यानवायुके कोपसे होता है ॥ १८ ॥ शरीर वारंवार धनुष्यकी तरह नवे, गीले और गर्वसरीखे नेत्र रहें, कपोतकी तरह कूजे ये लक्षण हों उस वायुको वैद्यजन “ अपतंत्रकनामवाला ” कहते हैं ॥ १९ ॥ अथ अप्रतानकवायुप्रकोप । मतान्तरे वदन्त्यन्ये प्रह्वप्रतानको मतः ॥ गृहीताङ्गं ततो वायुरप्रतानकः संस्मृतः ॥ २० ॥ कईक मतोंमें इस वायुको अप्रतानक कहते हैं अथवा जो आधा शरीरको बंध कर देवे उसको “ अप्रतानक ” वायु कहते हैं ॥ २० ॥ सोऽपि कफाश्रितो वायुः संपीडयति दण्डवत् ॥ स्तम्भयत्याशु गात्राणि सोऽपि दण्डाप्रतानकः॥२१॥हृद्वक्षोजकराङ्गुलौ गुल्फ- सन्धौ समाश्रितः॥स्नायुं प्रतानयेद्यस्तु सोऽपि स्नायुप्रतानकः ॥२२॥ बाह्यानामथ नाडीनां प्रतानयति मारुतः ॥ कट्या- श्रितो वा भवति सशल्यमिव कुर्वते ॥ २३ ॥ तमसाध्यं बुधाः प्राहुस्तञ्च वातं प्रतानकम्॥ अन्धं चतुर्थमाक्षेपमभिघातसमुद्भवम् ॥२४॥ अभिघातेन यो जातो न स साध्यः प्रतानकः ॥ ऊर्ध्वं तानयते यस्तु विशोषयति गात्रकम् ॥ २५ ॥ मोहतमः कृते वास्थिसन्धिसंशुष्कको मतः ॥ और वही वायु कफके आश्रय होके लाठीकी चोट सरीखी पीडा करता है, गात्रोंको बंध कर देता है वह दंडप्रतानक वायु कहाता है ॥ २१ ॥ हृदय, छाती, हाथोंकी अंगुली, गुल्फ-