भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० २१] भाषाटीकासमेता । ( ३६५ ) तम् ॥ सर्वाङ्गे चामवाते हि श्रेष्ठमेतद्विरेचनम् ॥३१॥ नागरस्य भागमेकं द्वौ भागौ क्रिमिजस्य तु ॥ त्रिवृद्भागत्रयं क्षिप्त्वा चूर्णं गुडसमं वटम् ॥ ३२ ॥ भक्षयेत्तथोष्णतोयेन पुनश्चोष्णं पयः पिबेत् ॥ एतेन जायते वामे विरेकः सुखकारकः ॥ ३३ ॥ विडङ्गशुण्ठी रास्ना च पथ्या त्रिकटुकान्विता॥ क्वाथमष्टावशेषं च कारयेद्भिषजांवरः ॥३४॥ दुग्धं क्वाथार्द्धकं तैलं तथैवैरण्डजं क्षिपेत् ॥ कर्षमात्रं सुपातव्यो विरेकश्चानुपानतः॥३५॥गुडूची त्रिफला पथ्या गुडेन सह भक्षयेत्॥विरेको ह्यामवातेषु श्रेष्ठमे- तत्सुखावहम् ॥ ३६ ॥ आमवातमें पीपल, दशमूल इनका क्वाथ बना पीना हित है और गिलोय, सोंठ इनके चूर्णमें गुड़ मिला खाना ॥ २४ ॥ तथा धनियां, सोंठ, अमलतास, देवदार, हरडै इनका चूर्ण आम- वातमें पाचन है और सुखको करनेवाला है ॥२५॥ पीपलोंके चूर्णको गरम जलके संग पीनेसे आमवात, मंदाग्नि, शूल, गुल्म इनका नाश होता है ॥ २६ ॥ और २५६ तोले खरेहटीका क्वाथ, दही, तक्र इनको २५६ तोले लेवे कुलथीका यूष २५६ तोले, कांजी २५६ तोले ॥ २७ ॥ इनको एक जगह मिलाके पकावे और इन आगे कही औषधोंको गेरे । सौंफ,देवदार, पीपल,गजपीपल॥ २८॥ त्रिसुगंधि अर्थात् दालचीनी,तेजपात, इलायची,मुरामांसी,कूठ, दशमूल इनका चूर्ण गेरे पीछे सिद्ध हो जावे तब उतार लेवे॥२९॥यह पीनेमें और निरूहवस्तिमें उदरके- भीतर युक्त करना चाहिये । यह संपूर्ण वातररोगोंको नाशता है,श्रेष्ठ है,गुणको देनेवाला है ॥३०॥ और अरंडीके तेलको गुड़ तथा दूधके संग पीवे।सर्वांगवातमें और आमवातमें यह जुलाब श्रेष्ठ है ॥ ३१ ॥ और सोंठ एक भाग, अगर दो भाग, निशोत तीन भाग इन सबोंके समान गुड़ मिला गोली बांध लेवे ॥ ३२ ॥ पीछे गरम जलके संग भक्षण करे और ऊपरसे गरम दूध पीवे इससे आमवातमें सुखका करनेवाला जुलाब होता है ॥ ३३ ॥ और वायविडंग, सोंठ, रास्ना, हरडै इनको जलमें चढ़ा अष्टमांश बाकी रहे तबतक क्वाथ बनावे ॥ ३४ ॥ पीछे क्वाथसे आधा दूध और अरंडीका तैल मिलावे पीछे यह एक तोला प्रमाण पीना चाहिये । इसमें जुलाबका अनुपान करे ॥ ३५ ॥ गिलोय, त्रिफला, हरडै इनको गुड़के संग भक्षण करे । यह जुलाब आमवातमें हित है, सुखको करनेवाली है ॥ ३६ ॥ अथ आमवातरोगको शमन करनेवाली औषध । अभया मस्तुना पिष्टा मधुशर्करयान्विता ॥आमातिसारं स्त- म्भेत्तु गुडामलकमेव च ॥३७॥ वत्सकं जीरके द्वे च दध्ना पिष्टं