भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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(१०) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ वाजीकरणका लक्षण-क्षीण हुए और अल्प वीर्यवाले मनुष्योंको पुष्ट करना और बलको बढ़ाना और समान धातुवालोंको तृप्त करना यह वाजीकरण कहाता है ॥ २० ॥ अथ रसायन तन्त्र । देहस्येन्द्रियदन्तानां दृढीकरणमेव च ॥ वलीपलितखालि- त्यवर्जनेऽपि च या क्रिया ॥ २१ ॥ पूर्ववैद्यप्रणीतं हि तद्रसायन- मुच्यते ॥ २२ ॥ अथ रसायनका लक्षण-शरीर, इंद्रिय और दंतोंको दृढ करना और शरीरकी वली, बालोंकी सफेदी और चँदुआपनको हटानेवाली जो क्रिया ॥ २१ ॥ और पूर्ववैद्य धन्व- न्तरि आदिका बनाया वह रसायनके नामसे कहा जाता है ॥ २२ ॥ अथ उपांगचिकित्सा । छिन्नं भिन्नं तथा भग्नं क्षतं पिच्चितमेव च ॥ तेषां दग्धप्रतीकारः प्रोक्तश्चोपाङ्गसंज्ञकः ॥ २३ ॥ अथ उपांगचिकित्साका लक्षण-छिन्न अर्थात् छेदित हुआ, भिन्न अर्थात् विदारित हुआ, भग्न अर्थात् टूटा हुआ, क्षत अर्थात् घाव आदि, पिच्चित अर्थात् पिचलित हुआ, दग्ध अर्थात् जला हुआ इनकी चिकित्साको उपांगसंज्ञक कहते हैं ॥ २३ ॥ इति वैद्यकसर्वस्वं चिकित्सागमभूषणम् ॥ पठित्वा तु सुधीः सम्यक्प्राप्स्यते सिद्धिसङ्गमम् ॥ २४ ॥ इति वैद्यकसर्वस्वे चिकित्सासंग्रहो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ ऐसे चिकित्सारूपी शास्त्रसे भूषित हुआ वैद्यकसर्वस्व वैद्य अच्छी तरह पढ़के सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ २४ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्रि-अनुवादितहारीतसंहिताभाषा- टीकायां प्रथमस्थाने चिकित्सासंग्रहो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः ३. वैद्यशिक्षाविधान । अथ वक्ष्यामि रोगाणामुपचारक्रमं तथा ॥ जानाति यो बुधः सम्यक् पूज्यते नृपसत्तमैः ॥ १ ॥ अथ रोगोंके चिकित्साक्रमके लक्षण-इसके अनंतर रोगोंकी चिकित्साके क्रमको- कहूंगा जो पंडित इसको अच्छी तरह जानता है वह राजालोगोंसे पूजित होता है॥ १ ॥