भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 424, कुल 548 में से

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पृष्ठ 424

( ३९२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- च पथ्या दुरालभा गोक्षुरपुष्करं वा ॥ एला कुरण्टाप्यथकर्कटीजं बीजं कषायः सुनिरुद्धमूत्रे ॥ ९ ॥ कुलत्थयुक्तः पटोलीमू- लकषायः प्रतिपाकः ॥ पुष्करमूलविमिश्रः प्रमेहपाषाणरोगघ्नः स्यात् ॥ १० ॥ यो मातुलुङ्गिकामूलं पिबेत्पर्युषिताम्बुना ॥ तस्यान्तः शर्करोद्भूतं दुःखं सद्यो विलीयते ॥ ११ ॥ गवां तक्रेण संंपिष्टं क्षिप्रनामकमौषधम् ॥ पिबेच्चिरेण तक्रञ्च शर्करादोषदू- षितः ॥ १२ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने मूत्र- कृच्छ्रचिकित्सा नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--इलायची, शिलाजीत, पीपल, पाषाणभेद इनके चूर्णको चावलोंके धोवनके जलके संग पीनेसे प्रमेहरोगका नाश होता है ॥ १ ॥ अरंडकी जड़, पाषाणभेद, गोखुरू, इलायची, वांसा, पीपली, मुलहटी इनका क्वाथ बना शिलाजीत मिला पीनेसे मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ २ ॥ और पथरीरोग, शर्करारोग, इनमें ८ तोला प्रमाण खांड मिला पीना चाहिये ॥ ३ ॥ एक तोला प्रमाण ठण्डा जल पीनेसे मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है तथा दहीके पानीसे लोहचूर्णको पान करे ॥ ४ ॥ और मूत्रकृ- च्छ्ररोगमें जवाखारका चूर्ण, हींग, कोहला, खांड इनको जलके संग पीवे ॥ ५ ॥ और शीतल जलके संग शतावरीके जड़को पीनेसे त्रिदोषसे उपजा मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ ६ ॥ और शर्करारोगमें खाँड़को पीवे और अमलतास, मूली, जवांसा धनियां शतावरी ॥ ७ ॥ पाषाणभेद, हरड़ै इनका क्वाथ पीनेसे मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है ॥ ८ ॥ पाषाणभेद, निशोत, हरड़ै, जवासा, गोखरू, पोहकरमूल, इलायची, कोरंटा, काकड़ीका बीज, इनका क्वाथ मूत्रबन्धमें पीना श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥ कुलथी, परवल, मूली, पोहकरमूल इनका क्वाथ बना पीनेसे प्रमेह, पथरीरोग इनका नाश होता है ॥ १० ॥ जो पुरुष बिजौराकी जड़को बासी जलके संग पीता है वह शर्करारोगसे छूट जाता है ॥ ११ ॥ और गौकी तक्रके संग कायफलको पीस पीनेसे शर्करारोग दूर होता है ॥ १२ ॥ इति वेरीनवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशा- स्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने मूत्रकृच्छ्रचिकित्सानामैकोनत्रिंशोऽध्यायः २९॥ त्रिंशोऽध्यायः ३०. अथ मूत्ररोधचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ पिबेत्कर्कटिकाबीजं त्रिफलासैन्धवान्वितम् ॥

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