भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 438

( ४०६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अत्यंत बोझाके उठानेसे, किसीबातके व्यसनसे मनुष्योंके घोर दुष्ट व्रण हो जाता है अथवा दूषित रक्तसे घोर व्रण होता है ॥ २ ॥ वातसे, पित्तसे, कफसे अथवा दोषोंसे तथा सब दोषोंके मिलापसे मांसमें प्रहर्ष होके रुधिर विखरके घोर दुष्ट व्रण हो जाता है ॥ ३ ॥ और त्वचा, रक्त, मेद इनको दूषित कर अस्थियोंके आश्रय होके उठेहुए दोष शनैः शनैः अत्यंत शोजाको उत्पन्न कर देते हैं ॥ ४ ॥ वहां रक्तसहित शूलसहित पीड़ा होती है और कंपना होती है तहां रूखाव्राण हो वह वातसे उपजा जानना ॥ ५॥ और जो तप्तदाहज्वर इसे युक्त हो और स्पर्शको सहै और जिसमें शीतसे सुख हो, शीघ्र पाक हो वह पित्तसे उपजा व्रण होता है॥ ॥ ६ ॥ कठिन हो, गोल आकार हो, घोर हो, शीतल हो, थोडी पीडा हो, गरम वस्तुको सहै, अति चिकना हो, बहुत कालमें पके वह कफसे उपजा व्रण जानना ॥ ७ ॥ जो सब लक्षण मिलते हों तो वह सन्निपातसे उपजा व्रण जानना और दो दोषोंसे उपजे व्रणमें दो दोषोंके लक्षण मिलते हैं ॥ ८ ॥ चोट आदिसे उपजे हुए चार प्रकारके व्रण होते हैं और अन्य जो नाडीव्रण होते हैं वे पीडासहित और वातसहित होते हैं ॥ ९ ॥ अन्य व्रण स्रोतोंमें होते हैं उनकी चिकित्साको सुनो। पहले तो उठते ही मांडका तरडा दे जिसे शायद बैठ ही जावे पीछे पसीना दिवावे अर्थात् अग्नि या गरम पदार्थसे सेंके ॥ १० ॥ फिर तीसरे पकावे पक जावे तब व्रणके फाड़नेकी विधि कही है, पीछे शोधन करे, पीछे व्रणको भरे ॥ ११ ॥ पीछे व्रणको हित करनेवाला क्रम करना चाहिये । रास्ना, वच, सूंठ बिजौरेका रस ॥ १२ ॥ कांजी इनसे धोवना वातके व्रणमें हित है और मुलहटी, महुआ, मजीठ, परवल, नींबके पत्ते ॥ १३ ॥ इनको दूधमें मिला काथ बना, शीतलकर पित्तका व्रण धोवना चाहिये ॥ १४ ॥ त्रिफला, कदंब, जामन, कैथा इनका काथ बना गरम २ से कफसे उपजा व्रण धोवना चाहिये ॥ १५ ॥ और बिजौरा, अरणी, मूली, कांजी, देवदार, सूठ इनका लेप करना वातव्रणमें हित है ॥ १६ ॥ नड, मूर्वा, मुलहटी, चन्दन, लाल चन्दन, इनको चावलोंके धोवनके जलमें पीस लेप करनेसे पित्तके व्रणका नाश होता है ॥ ॥ १७ ॥ और अंकोल, लोध्र, कदंब, अर्जुन वृक्ष, वेत, नींबके पत्ते इनको पीस व्रणपै लेप करे ॥ १८ ॥ और वण पकजावे अथवा गंभीर हो जावे, पीडासहित हो अथवा छेद हो रहा हो वहां वैद्यजनोंको शोधन और धावन करना चाहिये ॥ १९ ॥ करंजुआ, धव, नींब, कदंब, अर्जुन और वेत इनका चतुर्थांश काथ रहे तब उससे गंभीर व्रणको शोधन करे ॥ २० ॥ मंजीठ, लाखका रस, मनसिल रस, मनसिल, दोनों प्रकारकी हलदी इनको समान भागले बकरेके मूत्रमें पीस शहद मिला लेप करनेसे व्रणोंका शोधन होता है यह हित है और नींबके पत्तोंको पीस शहद मिला लेप करनेसे व्रणोंका शोधन होता है ॥ २१ ॥ २२ ॥ और नींबके पत्ते, तिल, शहद, दारुहलदी, तिलोंका कल्क इनके लेप करनेसे व्रणोंका शोधन होता है ॥ २३ ॥ तिल, नींब, बहेडा इनके पत्ते और पुष्पोंका