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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 440

(४०८) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पुनः प्रलेपनं कार्यं धवार्जुनकदम्बकैः ॥५॥ गिरिकर्णिकामू- लञ्च तथा वृक्षादनीमपि ॥ पिष्ट्वा प्रलेपनं कार्यं वाल्मीकश्ली- पदस्य च ॥ ६ ॥ सूरणकन्दकं पिष्ट्वा मधुना च घृतेन च ॥ लेपनं च हितं तस्य वाल्मीकश्लीपदापहम् ॥७॥ इत्यात्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने श्लीपदचिकित्सा नाम षट्त्रिंशो- ऽध्यायः ॥ ३६ ॥ व्रणमें कहेहुए उपचारोंकरके श्लीपदसंज्ञकरोग हो जाता है, वातसे उपजा श्लीपद स्फुटित हो, रूखा हो, श्याम वगवाला हो ॥ १ ॥ पित्तसे उपजे श्लीपद रोगमें दाहहो, पाकहो और ज्वर होता है और कफसे उपजा श्लीपदरोग चिकनाहो करडाहो शोजासे युक्त होता है ॥ २ ॥ सन्निपातसे उपजे श्लीपद रोगमें सब लक्षण मिलते हैं और मेदके आश्रय हुआ यह रोग सर्पकी बँवईके समान लक्षणोंवाला होता है ॥ ३ ॥ और वातसे उपजे इस रोगमें समान लक्षण होते हैं उसकी क्रिया व्रणमें कहीहुई करना चाहिये ॥ ४ ॥ और पहले कहाहुआ जात्यादिघृत लेप करनेमें हित है और धव, अर्जुनवृक्ष, कंदंब, ॥ ५ ॥ गिरिकर्णिकाकी मूल, अमरवेल, इनको पीस लेप करनेसे वल्मीकसंज्ञक श्लीपदरोगका नाश होता है ॥ ६ ॥ जमीकंदको पीस शहद और घृतमें मिला लेप करनेसे वल्मीकसंज्ञक श्लीपदरोगका नाश होता है ॥ ७ ॥ इति वेरीनिवार्सबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने श्लीपदचिकित्सानाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥ सप्तत्रिंशोऽध्यायः ३७. अथ अर्बुदरोगकी चिकित्सा । वाताभिघातपवनाद्व्रणाद्वापि तथा पुनः॥ रक्तनाड्यः प्ररोहन्ति रुन्धन्ति च तथा पुनः ॥१॥ तेन रक्तस्य मार्गस्तु रुध्यते तेन जायते ॥ अर्बुदञ्च महास्थूलं मार्गरोधाच्च जायते ॥२॥ वाता- न्मृदुच परुषं कफाच्च घनशीतलम् ॥पित्तेन दाहपाकार्यं विजा- नीयं विचक्षणैः॥३॥सन्निपातेन कठिनं घनं पाषाणसन्निभम्॥ वृद्धिंमच्च गंडुकं स्यादासाध्यं तद्भिषग्वर ॥४॥ तस्यादौ पाटनं

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