हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४० ] भाषाटीकासमेता । (४२१) वातलानि तथैव च ॥ ज्वरे प्रोक्तानि पथ्यानि तानि चात्र प्रयोजयेत् ॥ व्रणेषु कुष्ठराजीषु हितमेवोपचारिणाम् ॥ ६०॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने कुष्ठचिकित्सानामै- कोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ इति कायतन्त्रं समाप्तम् ॥ वातसे प्रेरा हुआ पित्त रोगरूप होके रक्तके संग कुपित हो शरीरको पांडुर अर्थात् कुछ पीला सहित सफेद वर्णवाला करदेता है ॥ ५० ॥ चित्त दुखी रहे विरूप होजावे ऐसे लक्ष- णोंको सुनो, यह कुष्ठ असाध्य और साध्य दो प्रकारका होता है ॥ ५१ ॥ जो कुछ लाल वर्णसे युक्त पीला वर्णवाला कुष्ठ हो वह सन्निपातसे उपजा जानना वह असाध्य होता है उसमें सब अंगमें चिकने और चितले होते हैं ॥ ५२ ॥ जो रूखा तथा पीला वर्ण- वाला पांडुरकुष्ठ हो वह साध्य होता है उसमें पाचन और शोधन करना तथा जुलाब दिलानी और फस्त खुलानी श्रेष्ठ है ॥ ५३ ॥ वांसा, गिलोय, त्रिफला, करंजुवा, परवल, नींव, अर्जुनवृक्ष, बेंत, पीपल, मँजीठ, इन्होंका कल्क बना चित्रकमंडल कुष्ठमें पीना हित है ॥ ५४ ॥ खैर, वांसा, नींव, परवल, धव, जवांसा, त्रिफला, इनका कल्क बना पीनेसे सबप्रकारके कुष्ठ, विसर्प, मंडल, पांडुरकुष्ठ, इनका नाश होता है ॥ ५५ ॥ पाठा, वायविडंग, पीपल, देवदार, चीता, पुआड, दोनों हलदी, मँजीठ, कूठ, वच, मुलहटी, सेंधानमक, इनको कांजीमें अथवा गोमूत्रमें अथवा रुधिरके रसमें पीसि ॥ ५६ ॥ लेप करनेसे चित्रकुष्ठका नाश होता है और खाजवाला कुष्ठ, विचार्चिका, कंडू, विस्फोटक, विसर्प इनका नाश होता है ॥ ५७ ॥ भंगरा, हलदी, दूब, जीरा, वायविडंग, कोले तिल, चीता, लाल चंदन ॥ ५८ ॥ इनको गोमूत्रमें पीस लेप करनेसे चित्रकुष्ठका नाश होता है और सबप्रकारके दाद, दद्रुकुष्ठ, विचार्चिका, विस्फोटक और विसर्प इनका नाश होता है ॥ ५९ ॥ कुष्ठरोगमें विदाही, खट्टा, वातवाला ऐसा भोजन नहीं करना चाहिये, और ज्वरमें कहेहुए जो पथ्य हैं वे यहाँ करने चाहिये और व्रणोंमें कुष्ठोंमें, यही उपचार करना श्रेष्ठ है ६० ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने कुष्ठचिकित्सानाम एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ चत्वारिंशोऽध्यायः ४०. अथ शालाक्य तंत्र । अथ शिरोरोगचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अतिभाषातियोगेन अतितीक्ष्णोष्णभावतः॥