भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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अ० ४४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४३१ ) सत्तम ॥ तथाचैवाभिघातेन जायते तीव्रवेदना ॥ ५ ॥ क्षतेन पूयं स्रवते बाल्याद्भवति चापरः ॥ तश्चापि लूतिदोषेण जायते कर्णजा रुजा ॥ ६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--कानमें शोथ हो, जल शेष रहजावे और मैल हो उससे अति पीडा होनेसे ऊंचे श्वासके रोकनेसे तथा वातादिक दोषोंके कुपित होनेसे संसर्गदोषोंसे, सन्निपातसे अथवा क्रिमियोंसे उपजे व्रण होनेसे मनुष्यके कानमें अत्यंत पीडा हो जाती है उससे बहुतसे शब्दोंको सुनता है॥२॥शब्दोंको मेघके गर्जनके समान और दांतोंके चाबनेके शब्दके समान सुनै शूल हो दाहहो शिरमें पीडा हो वह सब कुछ वीनके शब्दके समान सुनता है हे उत्तम वैद्य ! उसरोगको पित्तसे उपजा जानो ॥३॥शब्द सुननेसे मूर्च्छासीहो और मेघके गर्जनेसरीखा शब्द सुनै ये कफसे उपजे कर्णरोगके लक्षण हैं ॥ ४ ॥ क्रिमिदोषसे उपजे कर्णरोगमें रक्त सहित पीव गिरे और चोटसे उपजेमें तीव्र पीडा होती है ॥५॥ क्षतसे उपजेमें पीव गिरे और बालअवस्थामें लूतिरोगसे उपजे कर्णरोगमें पीडा उत्पन्न होती है ॥ ६ ॥ अथ कर्णरोगकी चिकित्सा । न कर्णरोगे जलपूरणञ्च न चूर्णमेतत्कथितं विधिज्ञैः॥तैलं हितं स्वेदनमेव कर्णे सबाष्पबिन्दुश्च हितो मतश्च ॥ ७ ॥ सैन्धवं समुद्रफेनश्च सूक्ष्मचूर्णं च कारयेत् ॥ सौवीरकरसेनापि वातिके कर्णपूरणम् ॥ ८ ॥ आर्द्रसौवीररसं शुण्ठीसैन्धवगुग्गुलम् ॥ माषकुलमाषरसेन तैलं पक्वातिचोष्णकम् ॥ ९ ॥ कटुतुम्बेन- धार्येत कर्णरोगे प्रशस्यते ॥१०॥ यष्टीमधुकुष्ठमरिष्टपत्रं निशा विशालासुमनःप्रवालाः॥विपाचितं कर्णभवे च शूले सपैत्तिके वा घृतमेव शस्तम् ॥ ११॥ ब्राह्मीरसं सैन्धवकं विडङ्गं सभृङ्गराजस्य घृतेन युक्तम्॥तथैव सौवीररसञ्च पथ्या शृतं च वस्त्रे परिपूर्ण- मेतत् ॥ १२ ॥ हितं भवेत्तच्छ्रुतिपूरणाय पूयं सरक्तं क्रिमिजं निहन्ति ॥ १३ ॥ सर्वे प्रोक्ताः शिरोरोगास्तैलानि च घृतानि च ॥ जात्यादिकान्वा युञ्जीत शिरोरोगविदांवरः॥१४॥वात- १ 'सौवीरं काञ्जिके स्रोतोऽञ्जने च बदरीफले' इति मेदिनी ।