हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४३६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
पीस आंजनेसे अथवा गुड़के संग कायफलको पीस नेत्ररोगोंका नाश होता है ॥ २७ ॥ बडा बहेड़ा, शंखकी नाभी, सेंधामक इनको दूधमें तथा कांजीमें घिस पीछे गुड़ मिला बत्ती बना नेत्रमें आंजनेसे नेत्रके पटल रोगका नाशहोता है ॥ २८ ॥ नेत्ररोगमें वर्ज्य। सधूमञ्च सवातञ्च रूक्षमुष्णादिकं तथा ॥ कटुकाम्लं व्यवायञ्च वर्जयेन्नेत्ररोगिणाम् ॥ २९ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने नेत्ररोगचिकित्सानाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ४५ नेत्ररोगवालेको धुवांसहित वायु रूक्षा और गर्म भोजन कडुआ तथा खट्टा भोजन और मैथुन करना ये वर्ज देने चाहिये ॥ २९ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने नेत्ररोगचिकित्सानाम पंचचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ४६. अथ मुखरोगकी चिकित्सा ! आत्रेय उवाच ॥ ओष्ठौ च स्फुटितौ यस्य वातिवाहेन वाति- कात् ॥ तस्य सर्पिर्भक्षणञ्च ओष्ठदारणवारणे ॥१॥ सदाहञ्च भवेत्सौख्यं पैत्तिकं तं विनिर्दिशेत् ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--जिससे ओष्ठ फटे रहे वायु बहै वह वातसे उपजा मुखरोग जानना वहां मुख फटे हुएको निवारणकेवास्ते घृतकी मालिस करे ॥ १ ॥ दाहहो कभी शीतता उठे तहां पित्तसे उपजा रोग जानना ॥ २ ॥ ओष्ठ रोगकी चिकित्सा ! मधुना नवनीतेन ओष्ठयोर्म्रक्षणं मतम् ॥ लेपनं चोष्ठरोगेषु शर्करासहितं दधि॥३॥ सरक्तमोष्ठरोगञ्च दृष्ट्वा रक्तावसेचनम्॥ धवार्जुनकदम्बानां प्रलेपः स्यात्सुखावहः ॥ ४ ॥ यहां नैनीघृत शहद इनकी मालिस करना श्रेष्ठ है और इन पित्तके ओष्ठरोगोंमें खांड़, दही, इनकी मालिस करना श्रेष्ठ है ॥ ३ ॥ रक्तसहित ओष्ठरोग जानके रक्त निकलना श्रेष्ठ है और धव, अर्जुनवृक्ष, कदंव इनका लेप करना श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥