हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३.] भाषाटीकासमेता । ( १५ ) रनाथो बन्धुवर्जितः ॥ एतानव्याधिविनिग्रस्तान्प्रतिकुर्याद्वि- शेषतः ॥ २७ ॥ तपस्वी, ब्राह्मण, स्त्री, बालक, दीन, दुर्बल, बुद्धिमान्, पंडित ॥ २६ ॥ महात्मा, वेदपाठी, साधु, अनाथ और बंधुओंसे रहित इतने रोगियोंकी दवा विशेष करके करे ॥ २७ ॥ उपचारसे धन लेने योग्य मनुष्य । राजा च सुधनी चैव मण्डलीको बलाधिपः ॥ उपचार्य्योऽर्थसिद्धिः स्याद्वित्तं ग्राह्यं भयं न च॥ २८ ॥ राजा, धनवाला, साहूकार, छोटा राजा, ठाकुर, सेनाका स्वामी इन्होंकी चिकित्सा करे, जब वे अच्छे होजावें तब उनसे निर्भय होकर धन लेना चाहिये ॥ २८ ॥ यश मिलने योग्य मनुष्य । मध्यमा वणिजां पत्तिः पुरोधा ब्राह्मणादयः ॥ भट्टो वा गणका- ग्रण्यश्चिकित्स्यास्तु विशेषतः ॥ रोगग्रस्तेषु चैतेषु चिकित्सा कीर्तिकारिणी ॥ २९ ॥ इनसे नीचे बनियोंका व्यापार करनेवाले, पुरोहित, ब्राह्मणादिक, वेदज्ञ वा भाट, ज्योतिषी इनकी चिकित्सा ध्यानसे करें क्योंकि इन रोगियोंकी दवा करनेसे कीर्ति प्राप्त होती है॥२९॥ चिकित्सा करनेके अयोग्य मनुष्य । व्याधश्चोरस्तथा म्लेच्छो वह्निदो मत्स्यबन्धकः॥ ३० ॥ बहुद्वेषो ग्रामकूटो बन्धकी मांसविक्रयी॥ एतेषां व्याधिग्रस्तानां नैव कुर्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ३१ ॥ एतेभ्यः स्वार्थसिद्धिनोप- कारो हितमङ्गलम् ॥ तेषां जीवातसंजातो वैद्यो भवति दोषभाक् ॥ ३२ ॥ और कसाई, चोर, म्लेच्छ अग्नि लगानेवाला, मछलियोंको बींधनेवाला ॥ ३० ॥ बहुतोंका बैरी, ग्राममें चुगली करनेवाला, व्यभिचारिणी, मांसको बेचनेवाला इनके यदि रोग उत्पन्न हो तो वैद्य चिकित्सा नहीं करे ॥ ३१ ॥ क्योंकि इनसे स्वार्थकी सिद्धि नहीं है, न उपकार है और कल्याण भी नहीं है और मंगल भी नहीं है, इन्हें जीवदान देनेसे वैद्य दोषका भागी हो जाता है ॥ ३२ ॥ एवं ज्ञात्वा तु सद्द्यैद्यः कुर्यादथ प्रतिक्रियाम् ॥ धर्मार्थकामसम्पत्तिः कीर्तिर्लोके प्रवर्त्तते ॥ ३३ ॥ १ 'बन्धक्यसती कुलटेत्वरी' इत्यमरः ।