हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 471, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १६ ] भाषाटीकासमेता । (४३९) ॥२२॥ श्लेष्मोद्भवे मुखपाके हितं गण्डूषधारणम् ॥ रक्तजेषु विकारेषु रक्तस्रावं च कारयेत् ॥२३॥ कण्टकेनापि जिह्वायाश्ची- रयित्वा च लेपनम् ॥ मूर्वामुस्ताभयाशुण्ठीमागधीरजनीद्वयम् ॥२४॥ गुडेन मधुना युक्तं लेपनं रक्तजिह्वके ॥ मरिचञ्च वचा कुष्ठं हरीतक्याश्च चूर्णितम् ॥ घर्षणं श्लेष्मणि जाते जिह्वापाके हितं विदुः ॥ २५ ॥ वच, हरडै, बायविडंग, सोंठ, कालानमक, पीपली इनको घृतमें युक्त कर जिह्वापै घिसनेसे वातसे उपजा जिह्वारोग दूर होता है ॥ १९ ॥ कांजी, तक्रको गरम २ कर कुल्ले करे और मुलहटी, चन्दन, नागरमोथा, पीपलीको पीस शहदमें मिला ॥ २० ॥ लेप करनेसे पित्तदोषसे उपजा जिह्वास्फोटक रोग दूर होता है और ठंढे २ दूधके कुल्ले धारण करना ॥ २१ ॥ दंतरोग, जिह्वापाकमें हित है और लोध, अर्जुनवृक्ष कदंबका क्वाथ सुखसे सुहाता हुआ गरम २ मुखमें धारण करना ॥ २२ ॥ कफसे उपजे मुखपाक रोगमें हित है और रक्तसे उपजे विकारोंमें रक्त निकालना श्रेष्ठ है ॥ २३ ॥ काँटेसे जिह्वाको चीरके वहां मूर, नागरमोथा, हरडै, सूंठ, पीपली, दोनों हलदी ॥ २४ ॥ गुड, शहद, इनको मिला रक्तसे उपजे जिह्वारोगपै लेप करे और मिरच, वच, कूठका चूर्ण बना कफसे उपजे जिह्वारोगमें मसलना हित है ॥ २५ ॥ अथ गलगण्डरोगके लक्षण । तिलपिच्छिलगौल्यादिसेवनात्तिद्रवाद्यपि ॥ नवोदकेन कफजो जायते घण्टिकागदः ॥ २६ ॥ जिह्वामूले कण्ठसन्धौ श्लेष्मरक्त- समुद्भवः ॥ तेनास्यशोषो जडता ज्वरो मन्दश्च जायते ॥२७॥ शिरोव्यथारुचिस्तन्द्रा तथास्य जडता भवेत् ॥ तिल और झागोंवाला तथा गुल्ली बंधनेवाला और पतला ऐसे भोजनके सेवनेसे और नवीन जलसे कफसे उपजा हुआ घण्टिका संज्ञक रोग हो जाता है ॥ २६ ॥ जिह्वाकी मूलमें कंठकी सन्धिमें कफरक्तसे उपजा हुआ यह रोग होता है उससे मुखमें शोष हो, जडता हो, मन्दज्वर हो ॥ २७ ॥ शिरमें पीडा हो, अरुचि हो, तंद्रा हो, मुखमें जडता हो ॥ अथ गलगण्ड रोगकी चिकित्सा । तर्जन्यां कण्ठमध्ये तु संपीड्य रक्तपन्थिका ॥ २८ ॥ परिस्रुतं तथा रक्तं तदा विम्लापनं हितम् ॥ वचाञ्च मरिचं कृष्णाचूर्णं