भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ५२ ] भाषाटीकासमेता । ( ४५३) और कहीं मरजाता है इससे स्त्रीको कष्ट होता है ॥ २ ॥ अथवा लज्जासे स्त्रीकी भगका संकोच होनेसे मूढगर्भ होजाता है उसके लक्षणको कहते हैं ॥ ३ ॥ वस्तिमें शूल, योनिद्वार रुकजावे और जिसका उदर गर्जे और अफारा हो ॥ ४ ॥ पीड़ाहो, अंगभंगहो, निद्राभंगहो, हे उत्तम वैद्य ! उसे वातसे उपजा गर्भका निरोध जानना ॥ ॥ ५ ॥ शूलहो त्रिदोषसहित ज्वरहो, तृषाहो, दोषका भ्रमहो, मूत्रकृच्छ्रहो, शिरमें पीड़ाहो वह पित्तसे उपजा गर्भनिरोध जानना ॥ ६ ॥ आलस्यहो, तंद्राहो, निद्राहो, जड़पनाहो, अफाराहो, कंपनाहो, खाँसीहो, मुखमें विरसताहो, ये लक्षण कफसे उपजे मूढगर्भके हैं ॥ ७ ॥ दोदोषोंसे मिलेहुए लक्षण जानने जिसमें सब लक्षण मिलें वह सन्निपातका मूढगर्भ जानना ॥ ८ ॥ अथ मृतगर्भका लक्षण । भ्रममूर्च्छातृषाध्मानं वातरोधश्च विह्वलम् ॥ मूर्च्छावमिं सपा- रुष्यं दीनत्वमुपगच्छति ॥ ९ ॥ मृतगर्भं विजानीयादाशुकारी स्त्रियामपि ॥ अतो वक्ष्यामि भेषज्यं महामोहे विशारद ॥ १० ॥ भ्रमहो, मूर्च्छाहो, तृषाहो, अफाराहो, वातका रोधहो, विह्वलहो, मूर्च्छाहो, वमनहो, कठोर- ताहो, गरीबपनाहो ॥ ९ ॥ वहां स्त्रीके मराहुआ गर्भ जानना इसका इलाज शीघ्र ही करे, हे वैद्य ! इस महामोहकी अब औषधोंको कहेंगे ॥ १० ॥ अथ वातिकमूढगर्भचिकित्सा । वातिके मर्दनाभ्यङ्गं स्वेदनं वाल्पमेव च ॥ यवागू पञ्चकोलञ्च पाययेद्भिषगुत्तमः ॥ ११ ॥ वातके मृतगर्भमें मर्दन करै मालिस करै अल्प २ पसीना दिलावै और पंचकोल, अर्थात् सूंठ, पीपली, पीपलामूल, चव्य, चीता, इनकी यवागू पिलावै ॥ ११ ॥ अथ पैत्तिकमूढचिकित्सा । पैत्तिके शीतलं पानं शीतान्नसहितानि च ॥ व्यञ्जनानि तथा तस्य यष्टिकं पयसा पिबेत् ॥ १२॥ पित्तके मृतगर्भमें शीतल पान, शीतल अन्न और शाक आदिक देवे और मुलहठीको दूधके संग पीवे ॥ १२ ॥ अथ कफजमूढगर्भचिकित्सा। त्रिकटु त्रिफला कुष्ठं रोध्रं वत्सकधातकी ॥ सगुडं कथितं पाने श्लेष्मणा मूढगर्भके ॥ १३ ॥