हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- इनको पात्रमें घाल ध्वजाढांक उसमें गुड, काले पुष्प, काला चंदनआदि अनुलेप गेर, धूप, दीप, अक्षत इनसे युक्त करि मध्याह्न समयमें इस बलिको देवे ॥४२॥ और चौथेदिन बालकको कुमारी नामकी पूतना ग्रहण करती है इससे बालकको अति ताप होती है ॥ ४३ ॥ और शूना रहजावे तब पीडित हो और उसका मुख सूख जावे वारंवार रोवै ऐसी इसपूतनाकी पूजा और बलिको सुनो ॥ ४४ ॥ खीर, घृत, खांड, घृतके तीन दीप कर ॥ ४५ ॥ माटीकी मूर्त्ति, पुष्प, धूप, अक्षत, इन सबोंको मध्याह्न समयमें दक्षिणकी दिशामें स्थापित कर देवै ऐसे करनेसे बालक सुखी होता है ॥ ४६ ॥ और पाचवें दिन बालकको शाकुनी नामवाली पूतना ग्रहण करती है इससे ग्रसितहुआ बालक चूंचीको नहीं लेता है ॥ ४७॥ ज्वरसे युक्त हो वमन करे, रोवे खांसताहुआ कांपे ॥ ४८ ॥ इस पूतनाकी सुन्दर पूजा तिललड्डुओंसे करे और सफेदगंध, अक्षत, धूप इनसे मृत्तिकाकी मूर्त्ति बनाके उसका पूजन करे ॥ ४९ ॥ उत्तर- की दिशामें मध्याह्न समयसे पहिले इस बलिको देवे और छठे दिन शिवानामावाली पूतना बाल- कको ग्रहण करती है ॥ ५० ॥ इससे बालक रोवे अत्यंत श्वास लेवे वमन करे कभी कांपे और चूंची नहीं पीवे,ज्वर, अतिसार इनसे पीडीत होजावे ॥ ५१ ॥ इसकेवास्ते सातब्रीही धान्य और खीर, दही, दीपक, इनकी बलि देवे और तिलोंके चूर्णसे उसका पूजन करे ॥ ५२ ॥ और माटीकी मूर्त्तिका गंध पुष्प धूप अक्षत इनसे पूजन करे, ऐशान्यदिशामें तीसरे पहरमें इस बलिको देवे ॥ ५३ ॥ सातवेंदिन बालकको ऊर्ध्वकेशी नामवाली पूतना ग्रहण करती है जिसके लक्षण पहिली कही पूतनाके समान होते हैं और पहली कहीहुई बलि देवे ॥ ५४ ॥ और आठवें दिन सेनानामवाली पूतना ग्रहण करती है इससे ग्रसित हुआ बालक अत्यत श्वास लेवे, वारंवार हाथ कांपे ॥ ५५ ॥ इसकेवास्ते दही, चावल, तिलोंका चूर्ण, पोलिका, इनकी बलि देवे और धूप, दीप, अक्षत, गंध, पुष्प, नागरपान, इनसे पूजन कर ॥ ५६ ॥ अग्नि कोण दिशामें प्रदोष समयमें इस बलिको देवे इसीप्रकारके क्रमसे महीनोंकी और वर्षोकी भी देवे ॥ ५७ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यविद्वत्तशाख्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने बालचिकित्सानाम चतुःपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५५. —-❖❖❖-— अथ भूतविद्या । आत्रेय उवाच ॥ शून्ये देवकुले श्मशानभुवि वा वीथीप्रतोली- तले रथ्याकारविहारशून्यनगरे चारामके चत्वरे ॥ जायन्ते क्षुभिते बलानि हृदये क्षुद्रग्रहाणां नरे ते चापि प्रथिता ग्रहा दश-